इसलिए हमने पटना को राजधानी बना लिया


दिल्ली दूर थी,
इसलिए हमने पटना को राजधानी बना लिया.
सुकून तो गमे-शराब,
और हुश्ने – शबाब दोनों में हैं.
मेरी किस्मत ख़राब थी,
इसलिए खाके-राख पे एक दीप जला दिया.
गरीबों और औरतों के लिए लड़ने वालो ने,
कुछ इस कदर उनकी मज़बूरी और बेबसी को छला हैं,
की दूसरों की औरतों की करवा-चौथ के बेड़िया तोड़कर,
उनके जिस्म को अपने नीचे बिछा दिया।
दिल्ली दूर थी,
इसलिए हमने पटना को राजधानी बना लिया.

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो मेरे अंगों से खेले


वो मेरे अंगों से खेले,
तो हम समझें की आईने में कमी क्या है.
जमाना कहता है की,
करवा – चौथ मेरे पाँवों की बेड़ियाँ हैं.
वो क्या समझेंगे,
इन बेड़ियों को पहन के मैंने पाया क्या है.
आवो,
कभी सुन ले – सुना ले एक दूसरे को,
की तुमने औरत को हर विस्तर पे सुला के,
उसके संग सो के,
किन उचाईयों पे पहुंचा दिया.
और मैं एक व्रत कर करवा – चौथ का,
कौन सा एहसास जी लिया है.

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिवाली और दाल


कलेजा चीर देहलू तू ऐसे मुस्का के,
अब धोती मत फाड़ दअ, देह – से देह लगाके।
सारा थाती चल गइल,
ई दाल 250 रुपया किलो खरीदे में,
अब साड़ी मत मांगे लगियह,
करवा – चौथ आ दिवाली तू बता के.

परमीत सिंह धुरंधर

करवा-चौथ


मैं दीवाना बहुत था जिन नजरों पे,
वो कातिल बड़ी थी अदाओं से.
मैं ज्यूँ – ज्यूँ उनके नजदीक आता गया,
वो पकड़ती गयीं मुझे हर नब्ज से.
मैं जन्नत समझ के जिसे रुक गया.
वो इतरा -इतरा के फिर,
रखने लगी मुझे ठोकरों में.
मैं सह गया हर सितम जिसकी मोहब्बत में,
उसने करवा-चौथ रखा किसी और के नाम में.

परमीत सिंह धुरंधर

राखी और करवा चौथ


राखी के बंधन को कैसे निभाए कोई,
अब करवा चौथ का खर्च भारी पर रहा है.
राखी मनाई जा रही है अब व्हाट्सऐप और फेसबुक पे,
मगर मंगलसूत्र आज भी सोने का माँगा जा रहा है.

परमीत सिंह धुरंधर