काजल


दीवानों की बस्ती अब कहाँ मिलती है,
अब तो सितारों का चमन है.
तुम जिसे मोहब्बत बता के इतरा रहे हो इतना,
जरा गौर से देखो उसमे कितने पैबंद हैं.
आँखों में काजल लगा के दिल चुरा ले मेरे,
ऐसा चेहरा आज तक ढूंढ रहा हूँ.
जो भी मिलते हैं इन राहों में,
उनके तो गालों, हाथों,
हर अंग पे लगा कुछ- न- कुछ है.
मैं कितना भी कहूँ अपनी सच्चाई,
उनकी अदा के सामने तो सब जूठ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर