उनकी जवानी का नशा है,
रातों की मस्ती,
और अंगों के चुभन से.
मेरी जवानी का मज़ा है,
जंगे – जमीन पे,
लहू बहाने में.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी जवानी का नशा है,
रातों की मस्ती,
और अंगों के चुभन से.
मेरी जवानी का मज़ा है,
जंगे – जमीन पे,
लहू बहाने में.
परमीत सिंह धुरंधर
उजड़ा हुआ गुलिस्ता मुझे दे दो,
फूल खिला कर उनमे लौटा दूंगा।
मेरा दर्द तुम सकझते नहीं हो,
जवानी है कुछ कर जाऊँगा।
तुम थक कर, हार कर,
सत्ता के सिहासन से चिपके हो,
मैंने हल थामा है, जवानी की मस्ती में।
तुम काँटों पे कांटे बिछा लो,
मैं उनपे राहें बना लूंगा।
मेरा दर्द तुम सकझते नहीं हो,
जवानी है कुछ कर जाऊँगा।
परमीत सिंह धुरंधर
दिल तो अभी भी जवानी लिए हैं,
कमर ही बस झुकी है रानी।
रौशनी निगाहों की कम हुई है,
साँसे तो आज भी है तूफानी।
परमीत सिंह धुरंधर
बचपन के शौक जवानी को दुःख देते हैं,
और जवानी की मौज़ बुढ़ापे को रुला देती है.
कोई क्या सितम ढायेगा मुझपे,
जिसकी औलाद ही उसे गैर बता देती है.
मोहब्बत का शौक लेकर चला था,
हाथों में गुलाब लेकर चला था.
अंदाजा नहीं था जमाने के नए रूप का,
जहाँ फ्रेंडशिप ही अब सबकुछ बिकवा देती है.
क्या किस्सा सुनोगे दोस्तों, उनकी डोली उठने के बाद,
अब तो जवानी भी बुढ़ापे का एहसास देती है.
इतना तरसने के बाद भोजन का क्या,
ऐसा खाना अब भूख और बढ़ा देती है.
मुझसे मिलने आते हो तो मेरा पता मत पूछ,
मेरे नाकामयाबी, घर आने वाली हर राह में दिए जल देती है.
परमीत सिंह धुरंधर