मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में


अपने पिता के प्रेम में पुकारता हूँ प्रभु शिव तुम्हे,
मेरे पिता को लौटा दो,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
मुझे भय नहीं मौत का, ताप का,
बस मुझे गोद दिला दो फिर वही,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

यादों का समंदर है पिता


तेरे यादों का समंदर है पिता मेरे दिल में,
क्या किसी से मोहब्बत चाहूँ जब सागर ही है मुझमे।
भटकती मेरी राहों को कैसे तुमने संभाला होगा,
अब जाके समझा जब कितनो को रुलाया है मैंने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था


जिंदगी के इस दौर में अकेला पड़ गया हूँ,
भीड़ से सजी इस बस्ती में भी मैं तन्हा पड़ गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.
आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था,
बन के भौंरा, मैं भी मंडराता था.
अगर आप होते, तो मैं इठलाता,
अगर आप होते, तो मैं मंडराता,
फूल तो लाखों हैं, पर उनमे अब वो बात नहीं,
रिश्ते तो कई बन रहे, मगर वो मिठास नहीं।
रिश्तों के संगम में भी मैं प्यासा रह गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.

There is no meaning to have living relationship if you do not have a good relationship with your father.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता के प्यार का प्याला


हर पुत्र को पिता के प्यार का प्याला मिलना चाहिए,
ए खुदा,
जब तक पुत्र की प्यास न मिट जाए,
पिता – पुत्र का साथ बना रहना चाहिए।
सर्प – दंस से भी ज्यादा जहरीला है,
पिता से पुत्र का विछोह।
ए खुदा,
इस जहर का भी कोई तो काट होना चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

दंश


ना मोक्ष चाहता हूँ, ना भोग चाहता हूँ,
ना सुख कोई, ना सवर्ग,
ना फिर मानव जीवन चाहता हूँ.
ना अब छीनो पुत्रों से उनके पिता,
ना मिले फिर किसी को,
ए विधाता,
मैं जो ये दंश झेलता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


पिता तुम प्राणों से प्यारे हो,
हर जन्म में तुमसे ही साँसे मिलें।
तन तो तुम से विछुड़ गया,
मगर मन को तुम्हारा धाम मिलें।
पखार तो नहीं सका तुम्हारे चरणों को,
अब आसुंओं की धारा है.
तुमसे विछुड़ कर अब इन आँखों को भी,
बस पीड़ा – ही – पीड़ा है.

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत तेरी यादें आती हैं पिता


बहुत तेरी यादें आती हैं पिता,
राहें जितनी काली, उतनी ज्यादा।
मन तो करता हैं, सब तोड़ के रख दूँ,
पर फिर, अकेला पर जाता हूँ पिता।
ठोकरों में गिरता ही हूँ रहा,
ठोकरों में गिर ही मैं रहा.
जख्मों पे जब भी मलहम लगता हूँ मैं,
आँखों में तुम ही छलक आते हो पिता।

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


पिता ने दी है ये जिंदगी,
पिता पे ही लूटा दूंगा ये जिंदगी।
बिन पिता कुछ भी नहीं,
हैं ये जिंदगी।
तुम्हारे लिए छोड़ दिया है,
धर्म – ज्ञान की गाथा।
मैं तो लहराता रहूँगा,
अपने पिता का पताका।
पिता ने सींचा है मेरे प्राणों को,
पिता पे ही लूटा दूंगा अपने प्राणों को.
बिन पिता कुछ भी नहीं,
प्राणों की ये वेदी।

परमीत सिंह धुरंधर

पिता-परमेश्वर


मेरी उदण्डता, मेरी प्रचंडता,
मेरी शक्ति के, दाता तुम.
तुम पिता नहीं, परमेश्वर हो,
इस जीवन के, अधिष्ठाता तुम.
प्राणों से प्रिये हो मुझको,
प्यारी से भी प्यारे हो.
त्रिलोक को जीत के मैं लौटूं,
रखते हो ऐसी अभिलाषा तुम.
तुम पिता नहीं, परमेश्वर हो,
मेरे भाग्य के विधाता तुम.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


बड़े पिता की संतान होने का ये फायदा है की माँ का प्यार दोगुना हो जाता है.
खाने को मिले या न मिले, पहनने को मिले या न मिले, मगर पिता भी माँ बनके प्यार लुटाने लगता हैं.

परमीत सिंह धुरंधर