दुश्मनी


उनसे दुश्मनी, मोहब्बत में,
जैसे दुरी सितारों की, चाँद से.
दूर से देखने में,
वो मेरे करीब बैठी हैं.
मगर करीब रह के भी, रखती हैं,
चाँद फासला अपनी साँसों में.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


नदियां उछलती हैं तो किनारे डूब जाते हैं,
हुस्न सवरता हैं, तो दर्पण टूट जाते हैं.
मोहब्बत बाहों का बाहों से मिलान नहीं है यार,
ये तो वो रिश्ता हैं,
जहाँ बिना जाम के ही लैब भींग जाते हैं.
और हलक सूखे-सूखे, प्यासे रहते हैं,
हम जीते हैं उनके इंतज़ार में,
जो अपनी हर राह को जुदा किये बैठते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


शाम होते ही उनकी तलब होती है,
मोहब्बत जिंदगी बदल देती है.
रहम की भीख क्यों और किस से मांगे,
मेरी आंसूओं पे ही वो मुस्करा देती है.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


अब मोहब्बत में क्या पाक रहा दोस्तों,
जब इसमें भी पैसो का हिसाब होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


जख्मों को सीना नहीं आया, जाम को पीना नहीं आया,
हम तो देखते रह गए हुस्न उनका, घूघंट को उठाना नहीं आया.
वो झल्लाकर, चली गयीं एक नयी राह अपनी बनाकर,
हमको मोहब्बत में आज भी, भूलना नहीं आया.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


यादों की आह,
है मोहब्बत।
कभी देखा है क्या,
पतंगे को साथ रहते हुए.
मोहब्बत में मिटना,
ही है मुक्क़दर।
कभी देखा है क्या,
पतंगे को फिर किस्मत आजमाते हुए.

परमीत सिंह धुरंधर

सौदा


मेरी मोहब्बत को अपना कह दीजिये,
और अपना दर्द हमें दे दीजिये।
कुछ और हम न कभी कहेंगे,
ना आप ही कोई हमसे, और सौदा कीजिये।

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


नजरो से सियासत होती है,
अक़्ल तो बजीर रखते हैं.
जुदाई का नाम है मोहब्बत,
जोड़े वाले तो बस तकदीर रखते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

काजल


दीवानों की बस्ती अब कहाँ मिलती है,
अब तो सितारों का चमन है.
तुम जिसे मोहब्बत बता के इतरा रहे हो इतना,
जरा गौर से देखो उसमे कितने पैबंद हैं.
आँखों में काजल लगा के दिल चुरा ले मेरे,
ऐसा चेहरा आज तक ढूंढ रहा हूँ.
जो भी मिलते हैं इन राहों में,
उनके तो गालों, हाथों,
हर अंग पे लगा कुछ- न- कुछ है.
मैं कितना भी कहूँ अपनी सच्चाई,
उनकी अदा के सामने तो सब जूठ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


बचपन के शौक जवानी को दुःख देते हैं,
और जवानी की मौज़ बुढ़ापे को रुला देती है.
कोई क्या सितम ढायेगा मुझपे,
जिसकी औलाद ही उसे गैर बता देती है.
मोहब्बत का शौक लेकर चला था,
हाथों में गुलाब लेकर चला था.
अंदाजा नहीं था जमाने के नए रूप का,
जहाँ फ्रेंडशिप ही अब सबकुछ बिकवा देती है.
क्या किस्सा सुनोगे दोस्तों, उनकी डोली उठने के बाद,
अब तो जवानी भी बुढ़ापे का एहसास देती है.
इतना तरसने के बाद भोजन का क्या,
ऐसा खाना अब भूख और बढ़ा देती है.
मुझसे मिलने आते हो तो मेरा पता मत पूछ,
मेरे नाकामयाबी, घर आने वाली हर राह में दिए जल देती है.

परमीत सिंह धुरंधर