रावण-मेघनाथ


शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।
रण में रावण का आना तो बहुत दूर,
कोई मेघनाथ से पहले दो दावँ खेल के तो देखे।
इंद्रा को हरा के जो लौटा था मेरे पास,
प्रिये सुलोचना के लिए, जिसने दिया शेषनाग को पछाड़।
वो लहू है मेरा, कोई ललकार के तो देखे।
शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण


मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
वो कैलाश पे विराजे,
मेरे बुलंद हैं इरादे।
उनके ही छात्र-छाया में,
मैं बढ़ रहा निरंतर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
उनके ही चरणों में,
मैं सर हूँ नवाता।
उनके ही दर्शन से,
मेरा भाग्य खिल जाता।
मैं पुत्र उनका हूँ,
अज्ञानी – अपराधी।
और वो पिता हैं मेरे,
धर्म – ज्ञान के धुरंधर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
कैलाश को उठाया,
अपने बाजुओं पे.
त्रिलोक को दला है,
मैने अपने बल से.
सब-कुछ है समर्पित,
भोलेनाथ के चरणों में,
उन्ही की आशीष से है,
मेरे साँसों का ये समंदर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट है शिव-शंकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर