विभीषण – मेघनाथ


पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।
मैं अपनी तीरों से सृष्टि का संहार कर दूँ,
मुझे पिता के सिवा, कहीं कुछ भी दिखता नहीं।
तुम भूल गए भ्राता, कुल -संबंधी,
मैं इस जनम में ऐसा द्रोही तो नहीं।
काका श्री, तुम ज्ञानि हो समस्त वेदों को पढ़कर,
मगर मेरी नजरों में, ये पिता के चरणों की धूल भी नहीं।
मेरी जवानी चाहे मखमल पे फिसले,
मेरी जवानी चाहे काँटों पे बिखरे।
आखिरी क्षणों तक बस पिता से प्रेम करूँगा,
चाहे मोक्ष मिले या आत्मा भवसागर में भटके।
मेरी नजरों के सामने हो जाए लंका का पतन,
इस जीवन में ऐसा तो मेरे रहते होगा नहीं।
पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बाप ने जिंदगी दी है, बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा.


मेघनाथ: प्रणाम काका श्री. अच्छा हुआ, आप दिख गए. मई असमंजस में था की आप से मिलकर रणभूमि में जाऊं या जाकर मिलूं।
विभीषण: पुत्र, मैं तो तुम्हारा सदा से शुभचिंतक रहा हूँ. मेरी तुमसे कोई बैर नहीं है पुत्र.
मेघनाथ: हा हा हा हा!! काका श्री, पिता से बैर और उसके पुत्र से प्रेम। मैं वैसा पुत्र नहीं हूँ.
विभीषण: मैं तुम्हारे पिता का सागा भाई हूँ, उनका बैरी नहीं।
मेघनाथ: तो दुश्मनों की छावनी में क्यों ?
विभीषण: क्यों की, लंकेश धर्म भूल चुके हैं. तुम तो ज्ञानी हो. मैंने भ्राता कुम्भकर्ण को भी समझाया। तुम्हे भी कहता हूँ, ये युद्ध छोड़ के श्री राम के शरण में आ जाओ. इसमें हम सब का भला छुपा है.
मेघनाथ: बहुत-बहुत धन्यवाद काका श्री। अगर सबका भला इसी में छुपा रहता तो आपकी माता श्री आज यहाँ आपके साथ होती, वहाँ लंका में नहीं।
मेघनाथ: अगर श्री राम भगवान भी है, और स्वयं नारायण भी अपने असली रूप में आ जाएँ, तो भी मैं लंका का प्रतिनिधित्व करूंगा।
मेघनाथ: आखिर में इतना ही कहूँगा, काका श्री की “बाप ने जिंदगी दी है….. बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा।”

परमीत सिंह धुरंधर