वो नशा ही क्या?
जो उतर जाए.
हम अब तक बेहोस हैं,
उनकी जवानी में.
बरसों पहले,
एक बार बटन टुटा था,
चोली का.
अब तक अँधेरा है,
इन आँखों में.
वो खो गयी,
उस एक रात के बाद.
जामने में,
पैसों की चमक में.
मैं रह गया यूँ ही,
भटकता – जलता,
गरीबी में, भुखमरी में.
परमीत सिंह धुरंधर