जीवन-पथ पे भीष्म सा त्याग करो


जो मिले हैं, उनको प्यार करो
जो बिछुड़ गए, उन्हें याद करो
तुम मानव हो, बिना बिचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर प्रयास करो.

तुम देव नहीं, जो भोग मिलेगा
तुम पशु नहीं जो स्वछन्द विचरण करेगा
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर अभियान करो.

पथ में कुछ छाले मिलेंगें
पथ में कुछ कांटे भी मिलेंगे
सुन्दर अप्सराएं कभी,
दिखलायेंगी अपनी अदायें
तुम अपने ह्रदय से अब
माया-मिलन-मोह का त्याग करो.
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर हुंकार भरो.

क्या है नारी के देह में?
और क्या है उसके वक्षों पे?
कौन है सुन्दर वो नारी जो?
गृहणी बनकर संतुस्ट हुई
और कौन तृप्त हुई?
भला नगर-वधु बनकर।
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, भीष्म सा त्याग करो.

परमीत सिंह धुरंधर

बरसे भी तो जलती ही आग है


कण – कण में व्याप्त है
फिर भी अपर्याप्त है
लालसा है मन की
या लिखित बेचैन ही भाग्य है.
अंत नहीं भूख का
जहाँ मौत भी एक प्यास है.
आँखों के काजल सा
बिजुरी में बादल सा
बरसे भी तो हाँ, जलती ही आग है.
दिखता नहीं
निकलता नहीं
छुपता नहीं, फिर भी
रौशनी के मध्य
एक अदृश्य – अन्धकार है.

नयनों के खेल सा सा
दिलों के मेल सा
जो तोड़े न मन को
जो जोड़े ना तन को
जिससे मिलन को
हर पल उठती हाँ टिस है
मधुर मिलन पे फिर
लगती भी ठेस है.
ऐसी है वासना
फिर भी है छोटी
आगे उसके
ऐसा अनंत तक उसका विस्तार है.

बांधों तो वो बांधता नहीं है
साधो तो वो सधता नहीं है
कालचक्र से भी परे है वो
काल से भी वो मिटता नहीं है.
सृष्टि उसके बिना अपंग – अपूर्ण है
और उसके संग सृष्टि, नग्न – न्यून है.
है मिश्री के मिठास सा
अंगों पे श्रृंगार सा
नारी जिसके बिना सुखी एक डाल है.
और यौवन जिसके बिना हाँ बस एक लास है.

परमीत सिंह धुरंधर

Life goes like la-la la-la lu


The whole life goes like la-la la-la lu
Don’t worry and don’t try glue.
You cannot change anything except your path
But don’t keep changing it every night
By hoping something out of the blue.

 

Parmit Singh Dhurandhar

 

पहले विष तो पी लूँ शिव सा


शीशम के दस गाछ लगा दूँ,
दो बैल बाँध दूँ नाद पे.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
रधुकुल में भगीरत हुए,
गंगा को धरती पे लाने को.
जैसे भीष्म हुए बस,
गंगापुत्र  कहलाने को.
मैं भी धरा पे एक धारा बहा दूँ,
जो सींचते रहे मेरी गुलशन को.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
मेरा लक्ष्य नहीं जो,
साधित हो आसानी से.
वो भी नहीं जिसके पथ के,
असंख्य गामी हो.
पुत्र ही हूँ धुरंधर का,
हर क्षण -क्षण में एक कुरुक्षेत्र है.
पहले विष तो पी लूँ शिव सा,
जग को जीवन -अमृत दे के.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मानव का मूल्य


समुद्र की उठती लहरे,
भी क्रंदन से कम्पित हैं,
दूसरों का लक्ष्य मिटाती ये,
खुद अपने लक्ष्य से भ्रमित हैं.

भयंकर गर्जना करती,
हृदय में सबके,
भय को प्रवाहित करती ये,
स्वयम ही भय से ग्रसित हैं.

यह बिडम्बना हैं,
या समय का प्रवाह,
अथाह, अपार,
सम्पदा से सुशोभित ये,
मूर्खों की संगती में उत्तेजित हैं.

अहंकार है यह,
या चक्छुवों का,
सूर्य -प्रकाश में निर्बल होना,
या भाग्य ही हैं,
इन विशाल- बलवान लहरों का,
चाहे राम के बाण हो, या कृष्णा के पग
हर जनम में मानव से, ये पराजित है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

युद्ध निरंतर होगा


तुम थाम लो समंदर,
हम आकाश थामेंगे।
अब युद्ध निरंतर होगा,
या तो जीत हो मेरी,
या हम प्राण त्यागेंगे।
अब खोने को कुछ नहीं बचा,
सिवा इस शरीर के.
इसलिए आखिरी साँसों तक,
तुम्हारे विरोध में हर आवाज,
की हम हाथ थामेंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है


मुझे हार बर्दास्त नहीं,
और जीत की कोई चाह नहीं।
संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है,
जब तक मंजिल,
आ जाती मेरे पास नहीं।
तारो-चाँद से, ये माना,
की किस्मत का है लेना – देना।
मगर मेरे हौसलों पे,
इनकी गति का कोई असर नहीं।
हर चट्टान मैं तोड़ दूंगा,
अगर वो मेरे राहों में आये.
उबड़-खाबड़ राहों के बिना,
मिलती धरा को कभी प्रवाह नहीं।
संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है,
जब तक मंजिल,
आ जाती मेरे पास नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं दिया जलाता रहूँगा


लड़ाई होगी,
जब तक आसमान मुझे मेरी जगह न दे दे.
मैं दिया जलाता रहूँगा,
हर अँधेरी राह में,
जब तक सूरज मेरे आँगन में अपनी किरण न बिखरा दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग तो लड़ना होगा


जीत के लिए,
जंग तो लड़ना होगा।
सत्ता पाने के लिए,
सत्ताधीशों को उखाड़ना होगा।
न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते,
यूँ सर झुका कर अब इनसे।
न्याय चाहिए तो,
आँखे मिलाकर,
न्यायधीशों को ललकारना होगा।
जिन्हें प्यार से आहार चाहिए,
वो बैठ जाएँ अपने घर और गोशालों में.
सबेरा देखने वालों को,
इन अंधेरों से गुजरना होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Be in P<0.05


For your dream you have to die,
Does not matter, how high you fly.
टूटे रिश्तों को बचा लो,
इसी में हैं सबकी भलाई।
The world is always unfair,
As, it goes behind the average.
If you want to excel,
You have to be in P<0.05.
For your dream you have to die,
Does not matter, how high you fly.

 

Parmit Singh Dhurandhar