पतंगों का प्रेम


तुम्हारा चरित्र तुम्हारी सूरत नहीं,
हमारा चरित्र ही हमारी सूरत है.
बिजलिया कितना भी चमक ले,
पतंगों का प्रेम बस दीयों के नसीब में है.

Character is everything!!!

परमीत सिंह धुरंधर

बात वसूलों की है


बात वजूदों  की  नहीं,
बात  वसूलों  की  है,
बात  खंडहरों  की नहीं,
बात  इमारतों  की  है,
बात  कंचे  खेलते  हाथों  की  नहीं,
बात  बेरोजगारों  की  है,
और  बात  जवानी  ढकती  दुप्पट्टे  की  नहीं,
बात  तो  तिल – तिल  सिसकती  जवानी  की  है,
बात  अब  जात-धर्म  की  नहीं,
बात  अब  हमारे  और  आपके  घरों  की है.

We need to change the society which is not able to erase the discrimination among us.

परमीत सिंह धुरंधर

मजा : मौत तक प्रयास में है


नशा जीत में नहीं,
जंग में है.
सागर की लहरो में नहीं,
मजधार में है.
लड़ना है जिंदगी में,
चारो तरफ से फंस के.
तैरना है सागर को,
मजधार में डूब के.
जोश सागर के पार जाने या,
पहाड़ की छोटी पे चढ़ने में नहीं,
मौत तक प्रयास में है.
मजा लहूँ के बहने में नहीं,
उसके रिसने में है.
नशा तलवार की धार में नहीं,
उसके टकराव में है,
उसकी आवाज में है.

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन हो तो शिव सा


जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
मैं चखुं बस विष को,
जग को अमृत-पान दूँ.
अवघड कहे जग मुझे,
या भभूत-धारी।
या फिर योगी बन के,
मैं भटकता रहूँ।
पर भगीरथ के एक पुकार पे,
मैं प्रलय को बाँध दूँ.
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

बिखरना है जिंदगी


बिखरना है जिंदगी इस कदर जमाने में,
की जर्रे – जर्रे में खुशबु रहे.

परमीत सिंह धुरंधर

स्वाभिमान का दीप


आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
देव नहीं तुम,
जो रस का भोग हो।
ना दानव हो तुम,
जो दुष्ट तुम बनो।
मानव हो,
मृत्यु से तुम बंधे।
तो साँसों में,
स्वाभिमान का दीप,
जलाइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
इस धरा पे,
हर दुःख,
तुम्हारे लिए।
इन राहों की,
हर पीड़ा,
सिर्फ तुम्हारे लिए।
मगर,
जवानी है तुमको मिली,
तो हिमालय से,
टकराइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं तब भी लड़ूंगा


जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
आहे भरने की न फुर्सत हो,
ना शिकायत के शब्द गढ़ने की.
जहाँ जिस्म को सावन का,
मन को प्रियतमा का एहसास न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
पग थक गए हो, पर पथ ख़त्म न हो.
आँखे मूंद रही हो, पर मंजिल न हो.
तन से रिस्ते खून को भी बहने से,
रोकने का जब समय न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
ह्रदय में हुंकार तो उठे, पर
आँखों से बहे भी ना बन के धारा।
जब अपनी ही साँसे बोझ लगे,
और कोई न हो सहारा।
जब मेरे बस में ही मेरा वक्त न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
मैं तब भी आगे बढूंगा,
मैं तब भी चलूँगा।
मैं तब भी लड़ूंगा,
ऐसी कोई ललकार तो हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.

परमीत सिंह धुरंधर

सितमगर


सितम बहुत हुई, ए सितमगर,
अब लड़ेंगे हम.
भय, डर कुछ भी नहीं है,
अब कोई समझौता नहीं करेंगे हम.

परमीत सिंह धुरंधर

लक्ष्य और कर्ण


ए दिल,
ए दिल,
उड़-उड़,
के देख ले,
सपना है तेरा।
टूट जाए,
मिट जाए,
क्या जाता है तेरा।
यूँ ही, तू तो,
ठुकराया हुआ है,
यूँ ही, तू तो,
कितनी रातो से,
सोया नहीं।
तो उठ-उठ,
के मार,
लक्ष्य है तेरा।
जीते,
न जीते तू,
कट जाए,
मिट जाए,
क्या जाता है,
परमीत तेरा।

प्रयास


उल-जुलूल,
हरकते,
अब बंद कर
ए दिल,
कब चाँद धरती पे,
आने वाला हैं.
प्रयास ही करना है,
तो, नहर बनाने में कर,
कब तेरी फसलों को,
सागर आके सींचने वाला है.
कलियाँ जो खिल नहीं सकती
बागों में तेरे,
उनके लिए, अपनी जमीं को,
न छोड़, परमीत
की कब कलियों से,
बचपन पलने वाला हैं.