हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं


मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभी रहे दी घोंसला में


ऐसे मत चलाईं राजा जी,
गुलेल तान – तान के.
की छोट बिया चिड़ाइया,
अभी रहे दी घोंसला में.
कब तक रही चिड़ाइया,
रानी ई घोंसला में.
आज उड़े द, ले लेव इहो
मजा खुलल आसमा के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम एक धागे में बंध के


मुझे हर रिश्ता पसंद है तेरी आँखों से होकर,
आ जुल्म-सितम सब सह लें, हम एक धागे में बंध के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे


यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे,
और तू यूँ ही मेरी बाहों में सिमटती रहे.
तेरी साँसे जीवित रखें मेरी नसों को,
यूँ ही मेरे रुधिर को गर्मी देती रहें।
मेरी पलकों पे तेरी ओठो का भार रहे,
बस एक रात ही सही सोनिये,
तेरी अधरें मेरी अधरों का आधार बनें।
ऐसे फिर रसपान करता रहूँ रात भर,
की जीवन भर गुमान रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब से तुम जवान हुई


जब से तुम जवान हुई,
सारा शहर परेशान हुआ.
मयखाने तक सुख गए,
जो तेरा दीदार हुआ.
बादलों ने मंडराना छोड़ा,
भौरों ने कलियों संग,
गुनगुनाना छोड़ा।
आँखों में उतर आएं हैं,
आसमान के सारे तारे।
जब से दुपट्टा तेरा,
कुछ ज्यादा ही ढलकने लगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं


दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं,
इसलिए तो हुस्न वाले इनसे सवरतें हैं.
करीब आने पे बोझ बढ़ जाता है,
इसलिए हर रात के बाद वो शहर बदल लेते हैं.
जाने आँचल है या बवंडर -तूफ़ान मरुत्स्थल का,
सैकड़ों को सुला कर बाहों में,
वो अब भी मासूम बन लेते हैं.
इश्क़ के नसीब में उजड़ना ही लिखा है,
ये तो हुस्न वाले हैं जो हवाओं के संग मुख मोड़ लेते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बटवारा


मोहब्बत में बटवारा कुछ ऐसे हुआ,
तन्हाई मेरे हिस्से,
और शहनाई उनकी झोली में गिरा।
मैनें मुस्करा कर ग़मों में भी,
काँटों को चूमा.
उन्होंने फूलों के सेज को भीं,
बस आंसूँओं से धोया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेबसी का दंश


दिल के हाथों मजबूर,
अंदाजे – हुस्न पे, कितने लिख गए.
बेबसी का दंश देखिये,
जाते – जाते भी जमाने से,
इश्क़ को बेवफा और हुस्न को,
मासूम लिख गए.
कौन तनहा रहना चाहता है,
इन दीवारों में.
हम उनकी ख़ुशी के लिए,
खुद पे ये जुल्म ढा गए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जख्मों का समंदर


तेरा मुस्कराना,
मुझे जख्मों का समंदर दे गया.
फासले तो आ ही गए हैं दरमियाँ,
मगर निगाहों का असर रह गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनाव


मैंने लिखी जो कबिता वो तुम्हारे हुस्न पे थी,
उसने लिखी जो कबिता वो तुम्हारे जिस्म पे थी.
और, तुमने चुन लिया उसे ही,
जिसकी नजर तुम्हारे जिस्म पे थी.

 

परमीत सिंह धुरंधर