शिकायत


यूँ ही शाम को,
मिला करो.
ढलती धुप में,
हमसे जरा.
यूँ ही जाम नजर से,
पिलाया करों।
चढ़ती रात में,
हम को जरा.
तुम्हारा जादू ऐसा है,
अब नहीं संभाला जाता है.
यूँ ही थाम लो,
बाहों में अपने।
बढ़ के तुम,
हम को जरा.
कल तक थी शिकायत,
क़द्र नहीं हमें आपके जज्बातों का.
अब है शिकवा की,
कुछ ज्यादा ही ख़याल आ रहा है आपका।
यूँ ही हर मोड़ पे,
शिकायत करों।
मगर हंसकर,
तुम हमसे जरा.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


आँखों की किस्मत के क्या कहने,
धुप में भी छावं लगे.
दुप्पट्टा जब सर से ढलक के,
उनके सीने पे ठहरे।
कौन कम्बखत,
जन्नत की सैर चाहता है.
बस हवा का झोंका, एक पल को,
उनका दुप्पट्टा उड़ा दे.

परमीत सिंह धुरंधर

The birthday in November


A long twelve-year,

But, still I remember,

Your curly hair.

Your nose,

Your smile,

And,

Eyes full of tears.

A long twelve-year,

But, still I remember,

Your pain,

Your passion,

And,

Your fear.

A long twelve-year,

But still I remember,

Your touch,

Your breath,

And,

Your desire.

A long twelve-year,

But, still I remember,

A knife in your finger.

Cake,

And,

The birthday in November.

But, unable to understand,

How you forgot everything,

In a night, dear .

Parmit Singh Dhurandhar

ईद


मत पूछो मालिक,
ईद कैसी रही.
उनके ओठों पे थी सेवइयां,
मेरे सीने में आग जलती रही.

परमीत सिंह धुरंधर

तिरस्कार


हमने प्रेम में,
इतने तिरस्कार झेलें हैं.
आंसू भी निकलने से,
अब इंकार करते हैं.
चाँद कभी भी,
पलट के अमावस कर दे.
सैकड़ो सितारे भी,
इसके आगे विवस दीखते हैं.
जमाने का क्या है?
यहाँ तो सभी, दूसरों के चूल्हे,
की आग पे सेंकते हैं.
हम इस कदर,
दिल को जला चुके हैं,
हर शहर में, हुस्नवालों से पहले,
हम मयखाना ढूंढते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

वो तस्वीर नहीं बदले


शहंशाहों के तख़्त बदल गए,
पर अंदाज नहीं बदले।
तुम्हारी जवानी ढल गयी होगी,
मगर हमारे इरादे नहीं बदले।
भीड़ से फौज नहीं बनती,
हमने आज तक,
म्यान में तलवार नहीं बदले।
सुनता हूँ रोज की,
तुम्हारी जुल्फें सफ़ेद हो गयी हैं।
मगर हमने आज तक,
वो तस्वीर नहीं बदले।
कभी मिलना,
तो देख लेना खुद ही,
घांस की रोटी खाकर,
जमीन पर सो कर भी.
इस राजपूत ने, आज तक,
आज भी वो चाहत नहीं बदले।

परमीत सिंह धुरंधर

बुढऊ राजधानी


अइसन तहर जवानी ए रानी,
अइसन तहर जवानी ए रानी।
बालम भये रसिया,
बुढऊ राजधानी।
नाद के बैल,
भुखाइल खड़ा.
खेल में फसल,
सुख के भइल काला।
अइसन तहर कमरिया ए रानी,
देवर धइलन खटिया,
सास भरे पानी।

परमीत सिंह धुरंधर

हर रात जब डूबना ही है


बिखर जाती है काजल,
जब भी डालूं आँख में.
क्या बांधू गजरा,
कैसे इन जुल्फों में.
हर रात टूटती हैं,
मेरी ही आगोस में.
चूड़ी, कंगन और झुमके,
सब उदास है.
कितना भी सम्भालूँ,
इन्हे.
चोर ले ही जाता है,
हर रात उतार के.
जल रहा है दर्पण,
मेरे विरहा की आग में.
कई मास बीते यूँ ही इसकी,
बिना निहारे अंगो को मेरे.
क्या सजाऊँ इनको,
किसी खुसबू से.
हर रात जब डूबना ही है,
इनको फिर पसीने में.

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


दिल धड़क – धड़क के कह रहा है,
मैं समंदर को मथ दूँ.
तू घूँघट तो खोल एक बार बस,
मैं सब कुछ आज अपना बेंच दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी – मौत


तेरे दो नैनों के समंदर में,
कितनों के नाव डूबें हैं.
बस ओठों तक आने दे मुझे,
फिर जिंदगी – मौत, सब झूठे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर