कभी दरिया उछलती हो


कभी तेरे आँखों का समंदर हो,
कभी मेरी बाहों का किनारा।
कभी दरिया उछलती हो,
कभी डूबा हो किनारा।
कभी दूर गगन पे हो तारें,
कभी दिए से हो उजियारा।
कभी तेरी आँचल से बांध कर कटे,
कभी रातें हो तेरी जुल्फों का साया।
कभी यूँ ही,
आलिंगन हो ओठों को चूमकर,
कभी हो दूर से,
शर्म से बोझिल आँखों का सहारा।

परमीत सिंह धुरंधर

धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें


जब तुम खामोश हो जाती हो,
मेरी बाहों में आकर।
हर थकान मिट जाती है,
तुम्हारी साँसों को छूकर।
यूँ ही गुजरती रहें रातें,
बिना कुछ कहे – सुने।
बस तेरी झुकी पलकें हों,
और मेरी गर्म साँसे।
मुद्दत तक हो यूँ ही बरसात,
की डूब जाए हर खेत और खलिहान।
यूँ ही सुलगती रहे, ये आग चूल्हे की,
न रोटी पके और न जले,
बस धुंओं से धुंधला, तेरा जिस्म हो,
और धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें।

परमीत सिंह धुरंधर

अधरों पे आग


मैं अपनी जुल्फों में बांधकर उनको,
जो इतराई,
वो मेरी नस – नस को झनका गए.
मैं ह्रदय चुराकर जो संवरने लगी,
वो दर्पण को सौतन मेरी बना गए.
प्यासा बनाकर, उनको जो छोड़ा मैंने,
वो बाबुल को मेरे पराया बना गए.
रुलाया जिसको इश्क़ में जी भरकर मैंने,
वो अधरों पे मेरे आग जला गए.

परमीत सिंह धुरंधर

उन्नत वक्ष


तुम्हारे उन्नत-उन्नत वक्षों पे,
फीका है चाँद अम्बर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम चलो तो दरिया सुख जाए,
प्यास बढ़ जाए सागर का.
तुम्हारे गहरे-गहरे नैनों पे,
दम्भ है झूठा सागर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम्हारे नितम्बों पे झूलती ये चोटी,
जैसे चन्दन बन का मतवाला भुजंग।
तुम्हारे मधुर – मधुर इन अधरों के आगे,
देवों का अमृत विषैला है.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


मोहब्बत में पगला के हम भी,
बुरका पहनने लगे हैं.
वो तो दिखती नहीं हैं,
और हम भी खुद ही सवारने लगे हैं.
शर्मो-हया की अपनी दे के दुहाई,
वो बैठी है घर की दीवारों में,
और हम भी उनके छत पे,
अपनी पतंगें भिड़ाने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

गुनाहों के साये


कई रिश्ते मेरे,
आज भी गुनाहों के साये में हैं.
और कई रिश्तों के लिए मैं,
आज भी गुनाहें कर जाऊँगा.
वो मेरी न बन सकी,
ये किस्मत नहीं,
उनकी मर्जी है,
वो अगर आज मुस्करा दें,
तो उनको अपना बनाने के लिए
आज भी क़यामत मचा जाऊंगा.

परमीत सिंह धुरंधर

मैराडोना मैं, मेडोना तू


रूप-रंग में सोना तू,
अंग-अंग से टोना तू,
आज तो घूँघट खोल दे रानी,
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
आज की रात लम्बी है,
तन-मन पे छाई मस्ती है.
बस अपने ओठों से पिला दे तू,
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.

परमीत सिंह धुरंधर

This is dedicated to my favorite player Meradona and his love for the game.

तनी रहे दीं सियन चोली के


तनी धीरे -धीरे छुईं राजा जी,
अभी – अभी त अ जवानी आइल बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं सियन चोली के,
दर्ज़ी लगन में बाहर गइल बा.
काहे ऐसे, काहे ऐसे बउराइल बानी,
सारा धन त अ रउरे खातिर बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं कुछ थाती राजा जी,
अभी कउन उमर भइल बा.
काहे ऐसे, काहे ऐसे भुखाइल बानी,
सारा त अ दही जामल बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं कुछ छाली राजा जी,
घिउवा बड़ा महंग भइल बा.

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी थी वो सुंदरी रे


जीवन प्यासा,
राते प्यासी,
प्यास बसी है,
इन अधरों पे.
ओठों के एक चुम्बन ने,
घाव किया दिल पे गहरी रे.
रात गयी,
वो भूल गयी.
मैं बैठा रहा,
बांधे वही गठरी रे.
नैनों का नैनों से,
फिर न मिलन ये होना था.
एक ही रात में सब ले गयीं,
ऐसी थी वो सुंदरी रे.

परमीत सिंह धुरंधर

कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी


गोरी जब से जवानी आई है,
हर तरफ से एक कहानी आई है.
कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी,
जिसकी सियान अब पुरानी हुई है.
हर गली, हर चौरस्ते पे,
सुबहा से होता है इंतज़ार तेरा।
जाने किस गली से तू निकलेगी,
और किन अंगों पे तेरे निशानी बनी हैं.
मत पूछ कैसे जीते हैं,
हम बेघर वाले।
हम पे तेरे आगोस की,
रूमानी अब तक छाई है.
थक के जो छूट गए,
तेरे आगोस से दूर.
उनके चेहरे पे, अब तक
वो जंगे-बईमानी खिली हुई है.

परमीत सिंह धुरंधर