इश्क़ और हुस्न


इश्क़ वो दुआ है दोस्तों,
जिसकी कोई सुनवाई नहीं।
क्यों की?
हुस्न के आगे कोई और बेवफाई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं चोली मेरी खुल गयी


दिले – नादानी में,
कई कहानी बन गयी.
कहीं चुनर मेरी ढलकी,
कहीं चोली मेरी खुल गयी.
किसी के निशाने पे थी मैं,
तो किसी के निशाने पे था दिल.
किस -किस को संभालती,
थी बड़ी मुश्किल।
नई-नवेली मेरी जवानी में,
कई कहानी बन गयी,
कहीं पायल मेरी टूटी,
कही मेरी कमर ही टूट गयी.
रस पी कर,
उड़ गए सारे ही भौरें।
मैं बनना चाही जिसकी,
वो सौतन मेरी ले आएं.
कच्ची पगडण्डी पे,
कई कहानी बन गयी.
कहीं तिजोरी मेरी लूटी,
कही मैं ही पूरी लूट गयी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे


तुम्हारी जवानी का नशा ही ऐसा है प्रिये,
बस आँखों ने संभाला है मुझे।
टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे,
सावन भी उतर आया है जिसपे खेलने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न को समझना आ गया


मेरे अश्कों पे तुम्हे मुस्कुराना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
जिसकी सत्ता है, तुम शौक़ीन उसकी,
चंद सिक्कों पे, तुम्हे आँचल ढलकाना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
नियत तुम्हारी हमसे अच्छा कौन समझेगा?
जिसे दौलत की चमक पे थिरकना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
औरत को वफादार लिखने वालों की कलम,
पे मुझे शक है,
जिन्हे चार दीवारों के अंदर चादर बदलना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चोलिये में फँसल बा


तहार चोलिया के तोड़ के बटन रानी,
आज कहबू त हो जाइ खुले – आम रानी।
ऐसे भी जानअ ता सारा ई जवार रानी,
तहार चोलिये में फँसल बा हमार जान रानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वफ़ा


उम्र गुजर जाए तेरी बाहों में,
फिर मुझे मेरी मौत का गम नहीं।
एक रात दे दे, वफ़ा की सच्ची में,
फिर तेरी वेवफाई का मुझे रंज नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

योगी जी के सरकार बा


तहरे कमर के बल पे, योगी जी के राज बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे रख दी तहरा पे हाथ हाँ.
त घुघंट उठा के चल अ, जोबन उछाल के चल अ,
मन करे त, अब लहंगा उठा के चल अ.
तहरे नजर के तीर पे, गिर गईल सरकार अखिलेश के,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे छू दी तहार एगो केश हाँ.
त पयाल बजा के चल अ, कंगन खनका के चल अ,
मन करे त, अब चोली से चुनर गिरा के चल अ.
तहरे जोबन के जोर पे योगी जी के सरकार बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे मुँह खोली तहरा खिलाफ हाँ.
तहरे कमर के बल पे, योगी जी के राज बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे रख दी तहरा पे हाथ हाँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चरचराये खटिया और चुये पलानी


अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।
आरा, छपरा से बलिया तक,
तहरे किस्सा, तहरे कहानी।
बलखाये अइसन तहार कमर,
की पुरवा में उठे पछुआ के लहर.
दिल्ली छोड़ के तहरे खातिर,
दुआर ओगरतानी।
जहिया कह देबू, घर से उठालेम,
मर्द अइसन हइन,
जेकर अभियों बाटे खाटी पानी।
अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे ह्रदय में एक दरिंदा धड़कता है


मुझसे मत पूछो यारों,
मेरे पास दिल है की नहीं।
दिल तो कब का टूट गया २००३ में,
अब तो मेरे ह्रदय में,
एक दरिंदा धड़कता है.
अब मौका मिले तो,
दबोच लूँ, खरोंच दूँ.
कहीं दन्त, तो कहीं नख के,
निशान छोड़ दूँ.
अश्रुओं की धारा में,
मैं भी उसकी मोहब्बत को,
तड़पती, विलखती,
चीत्कारती छोड़ दूँ.
मेरी मोहब्बत को जब,
उसने तार-तार किया चौराहे पे.
तब से मेरे मनो-मस्तिक में,
ये नंगापन बस गया है.
और मेरी हसरतों में,
अब बस सिर्फ हवस-ही-हवस है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता


पाकर हुस्न को, इतराना छोड़ दो.
वफ़ा और हुस्न का, कभी साथ नहीं होता।
जितनी भी राते, चाहे साथ गुजार लो
ह्रदय में हुस्न के, कभी एक समय,
कोई एक नहीं होता।

वही मेनका, वो ही शकुंतला,
हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता।
नस-नस में इनके मक्कारी है भरी,
इनके चेहरे से ये नकाब नहीं गिरता।
जब दिल टुटा मेरा तब मैंने जाना,
क्यों हुस्न पे किसी का एतबार नहीं होता?

 

परमीत सिंह धुरंधर