कर्क राशि की वो लड़की


नसीब, दो ही हैं.
आवो, उन्हें बदल लें.
फिर भी, तुम्हे डर है.
तो ये वादा है,
दर्द तुम्हारें, मेरे।
और खुशियाँ मेरी,
सब तुम्हारी।
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आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
हाथों से दूर, आँखों से दूर,
ओठों से दूर, किस्मत से भी दूर,
मगर, फिर भीं उनकी चाह हो गयी.
कर्क राशि की वो लड़की,
इतनी ख़ास लगी.
मार्च में ही सेप्तेम्बर,
कर गयी.
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
XXXXXXXXXX
यूँ तो निगाहें शरारत करेंगी,
मगर तुम मिलो तो पर्दा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।
लहराती हैं आँचल तुम्हारे लिए,
तुम्हारे लिए ही आँखें सवरतीं।
हर एक दरवाजे पे लगी हैं ये,
मगर तुम्हारे ही आहट से डरतीं।
यूँ तो साँसें पिघलती हैं रात दिन,
मगर तुम मिलो तो दुप्पट्टा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

नकाब


तड़प रहा हूँ सीने पे जख्म को लिए,
कहीं तो मिल ए दिलवर, नकाब को गिरा के.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।

परमीत सिंह धुरंधर

प्रण और चुम्बन


जब ग़मों की रात हो, प्रिये,
तुम ओठों से पिला देना।
जब नींदें न हों आँखों में,
ख़्वाब न हो जीने को.
तुम आँचल अपने सरका के,
अंगों को छलका देना।
कांटे – ही – कांटे हो पथ में,
और प्यास से कंठ भी अवरुद्ध हो.
तुम आँखों की मदिरा को अपने,
मेरे नस – नस में उतार देना.
जब तुम ही मेरे साथ तो,
तब विकत क्या है कोई प्रण मेरा.
मेरे हर पराजय पे भी तुम यूँ ही,
विजय श्री का मीठा चुम्बन लगा देना.

परमीत सिंह धुरंधर

सावन


अबकी बरस रानी, अबकी बरस,
तहरा के उठा के ले जाएं।
सावन बरसे या न बरसे,
अंग – अंग ताहर भिंगो देहम।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


मेरा इश्क़ मेरा इश्क़ है,
उनका हुस्न मेरा नहीं।
चाहत तो मुझे उन्ही की है,
मगर उनका जिस्म मेरा नहीं।
ये न इबादत है,
ना कोई जद्दोजहद उन्हें पाने की।
धड़कनो में मेरे महक है,
बस उन्हीं के आँचल की।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ का गाँठ


मैं बहारों सी आई हूँ,
तू इश्क़ बनके छा जा.
मैं रेशम की धागा सी,
तू उसमे गाँठ बनके पड़ जा.
मैं बलखाऊं, लहराऊं, हवाओं सी,
तू मेरी राहों में पर्वत बनके आजा.
जब शाम ढले, तू ताड़ छेड़े,
मेरी रातों को बादल बनके भिंगो जा.

परमीत सिंह धुरंधर

धनिया से धान भइल बारु


जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
चमकअ तारु, चमकावअ तारु,
नाक में नथुनिया डाल के.
लहकअ तारु, लहकावअ तारु,
योवन पे चुनरी डाल के.
पूरा खिल के खलिहान भइल बारु,
जब से जवान भइल बारुं,
धनिया से धान भइल बारु.
रूप ताहर नयका,
रंग ताहर नयका.
सोना के भाव भइल बारु,
जब से जवान भइल बारुं,
धनिया से धान भइल बारु.
महकअ तारु, महकावअ तारु,
केसिया में गजरा डाल के.
छलकअ तारु, छलकावअ तारु,
अँखियाँ में कजरा डाल के.
सरसो से महुआ भइल बारु,
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
लहर उठा दअ ,
जहर पिला दअ.
अंग-अंग से गुलाब भइल बारु,
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.

परमीत सिंह धुरंधर

रातों का दाग


खूबसूरत जिस्म पे,
अब भी है,
रातों का दाग.
खिड़कियाँ,
बंद ही रहने दो.
मुझे उजालों की नहीं,
अब भी,
इन ओठों की हैं प्यास।
ऐसा क्या है,
इन दिन- दोपहर में,
जो तुम मुझसे दूर भागती हो.
मत डालो,
ये उतारी हुई चुनर,
मुझे अब भी हैं,
इन अंगों की तलाश।

परमीत सिंह धुरंधर

चुम्बन : दांतों का खेल


वो एक कातिलाना,
अंदाज रखती हैं,
मेरे लहू की,
एक प्यास रखती हैं.
लोग कहते हैं जिसे मोहब्बत,
उस शम्रो-हया के पीछे जाने,
वो क्या -क्या ख़्वाब रखती हैं.
वो टकराती हैं राहों में,
अपना दुप्पट्टा लहरा के.
हम अपनी नजरे झुका के चलें,
तो भी शरीफ नहीं।
अपनी शराफत के पीछे जाने,
वो कैसे-कैसे नकाब रखती हैं.
दांतों का खेल है,
चुम्बन मोहब्बत में,
तभी तो बुड्ढों पे वो,
खिलखिला के हंसती हैं.
हम जैसे जवानों की जल रही है,
हसरते कुवारीं।
और ओठों की अपने ही दाँतो से,
वो दबा के रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

Kissing your partner has no meaning if your teeth are not involved in that.