बाढ़


खौफ बढ़ चूका है, दीवारे ढह चुकीं हैं.
मंदिर और मस्जिद दोनों सुनसान पड़े हैं.
वो निकलीं है आज सज के, सवर के,
बूढ़े भी अब ईमान छोड़ चुके हैं.
गली, चौरास्ता, छत, पेड़, खुलेआम,
हर मोड़ पे भीड़ बढ़ चुकी है.
हर सख्श पसीने से तर-बतर,
दिल की धड़कने थम चुकी है.
वो निकली हैं आज अपनी जुल्फें लहरा के,
बढ़ई, लोहार, धोबी, हलवाई,
जोरू, गोरु, सब काम छोड़ चुके हैं.
आग बढ़ रही है, रूह काँप रही है,
कंठ सुख रहे हैं, तन-मन तरप रहा है.
हिन्दू-मुस्लिम, जाट-पात, सब मिट चूका है,
हर तरफ से, छोटे-बड़े सबकी निगाहें टिक चुकी है.
वो निकली हैं आँखों में सुरमा लगा के,
अमीर-गरीब, गावं- जवार, पंडित-मौलवी,
सब इस बाढ़ में डूब चुके हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

योवन


लहरो को बाँध ले, ऐसा कोई किनारा देखा ही नहीं,
सागर की बात मत कर, उसकी नदियों में वो योवन ही नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

गहराई


बहुत जलील हुआ हूँ पर अब भी मज़ा आता है.
हुस्न ही उनका ऐसा है, देखने के बाद नशा आता है.
मत पूछ क्या पाता हूँ बिना बाँहों में गए उनके,
लहरों में उतर के कौन सागर की गहराई नाप के आता है.

परमीत सिंह धुरंधर

चाँद


शोर सुन के शहर वाले निकले,
भोर में फरियाद वाले निकले।
बिछा कर निगाहें बैठा हूँ हर गली-चौराहे पे,
जाने कब किधर से मेरा चाँद निकले।

परमीत सिंह धुरंधर

ज़माना


फूलों सा सुन्दर बदन और आँखों में शराब है,
फिर जाने क्यों कहते हैं सभी ज़माना ख़राब है.

परमीत सिंह धुरंधर

हाले-करम


अब खुदा भी नहीं पूछता मेरा हाले-करम,
अकेला रह गया हूँ उठा के तेरा जुदाई का गम.
मोहब्बत कभी भी इतनी शिद्दत से मत कर,
की उनका बिछुरना बन जाए जिंदगी का आखरी सितम.

परमीत सिंह धुरंधर

दाना


तरसने वाले तरसते रह गए,
उड़ाने वाले उड़ा ले गए.
हमें नहीं मालुम हुस्न और चिड़िया में अंतर,
शिकारी दाना दाल के, दोनों ले गए.

परमीत सिंह धुरंधर

मज़ा


क्या ढूंढता है इन आँखों में तू,
सितारे चाहिए या चाँद ढूंढता है तू.
दे सकती हूँ चंद राते चांदनी की मैं,
या पूरा आसमान ढूंढता है तू.
जाम का मज़ा हलके-हलके छलका के पीने में हैं,
या एक बार में ही गटकना चाहता है तू.
किस्मत है तेरी, पूरा मज़ा ले,
या प्यास अपनी मिटाना चाहता है तू.

परमीत सिंह धुरंधर

फितरत


कहाँ तक जला के रखूं उमिद्दों का दिया,
हवाओं का रुख तो मेरे हाथ में नहीं।
मोहब्बत तो बहुत है उनको हमसे,
रिश्तों को निभाना उनकी फितरत नहीं।
क्यों करते हो शिकायत हुस्न से,
वो क्या वफ़ा करे जब तेरी किस्मत नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जोबना


गोरी तहरे जोबना के भार से आइल बा देल्ली में भूचाल रे,

गोरी तहरे नजरिया के कटार से तुतल बा दियारा के बाँध रे परमित.