मोहब्बत में अपने ये रोजे


किस्से तो कई हैं,
बंद दीवारों के अंदर।
हौसलें नहीं है,
की कोई उनको खुले आसमान के तले पढ़े.
मेरी मोहब्बत कुछ इस कदर हैं उनसे,
की पलके बिछा दी,
उन्होंने जहाँ – जहाँ अपने कदम रखे.
जा चुन ले किसी को भी जमाने में,
मुझे छोड़कर।
हम फिर भी रखेंगे,
तेरी मोहब्बत में अपने ये रोजे।

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

निहारती ही रही आईने को उम्र भर


तुम कभी समझ ही नहीं सके हमारे रिश्ते को दिल से,
तुम चाहे जितना भी पढ़ लो किताबें अपने जीवन में.
मुझे ये गम नहीं की हम एक साथ न रह सके,
तुमने कभी चाहा ही नहीं की हम साथ रहें खुशियां बाँट के.
तुम निहारती ही रही आईने को उम्र भर,
कभी खवाब संजोया ही नहीं आँखों को मूंद के.
लाखों हैं यहाँ तुम्हारे जोबन के गिरफ्त में,
मगर तुम अब भी नहीं हो किसी एक के भी वफाये – जहन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बक्षों पे उठाया नहीं जाता


हुजूर, आपसे अब यहाँ उम्र का गुजर नहीं होता,
कुछ मिले हमें भी अब की यूँ तन्हा इसारा नहीं होता।
ढलें हैं चेहरे ही बस, मंसूबें अब भी जवानी की मौजों में हैं,
यूँ घूँघट में अब सब कुछ मुझसे बांधा नहीं जाता।
कब तक आईना दिखलाये मुझे भंवर मेरी योवन का,
अब आँचल का भार यूँ बक्षों पे उठाया नहीं जाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


जिन्दगी में सुख का और अँधेरे में हुस्न का जवाब नहीं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खत्री और Crassa


कैसे सहोगी पतली कमर पे रानी,
इतना भार बरसात में.
मेरी बाहों का सहारा ले लो,
नहीं तो खत्री ले जाएगा मझधार में.
मैं तो हूँ दिल का बड़ा भोला – भाला,
धीरे-धीरे करूँगा तुम्हे प्यार।
खत्री तो हैं शातिर – शैतान,
चूस लेगा सारा रस, एक ही बार में.
कैसे संभालोगी अकेले रानी,
ये खनकती जवानी इस संसार में.
मेरे साथ घर बसा लो,
नहीं तो खत्री लूट लेगा ये श्रृंगार रे.
मैं तो हूँ दिल से बड़ा सीधा -सच्चा,
उठाऊंगा नखरे तुम्हारे जीवन भर.
खत्री तो है खिलाड़ी – रंगबाज,
अंग – अंग निचोड़ लेगा, एक ही बार में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खत्री भी घायल है


लूट लेंगे रानी, तेरी जावानी के भार को,
कब तक संभालोगी, इस कच्ची कमान को.
हम भी हैं गावँ के, मिटटी में खेले हैं,
चित कर देंगे तुम्हे, बस लग जाने दो एक दाव तो.
लूट लेंगे रानी, तेरी जावानी के भार को,
कब तक संभालोगी, इस कच्ची कमान को.
सबकी नजर है, सबको खबर हैं,
खत्री भी घायल है, देख तेरे अंग – अंग को.
लूट लेंगे रानी, तेरी जावानी के भार को,
कब तक संभालोगी, इस कच्ची कमान को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नजर


जवानी के तीर थे,
नजर को मशहूर कर गए.
जब – जब ढलका उनका आँचल,
शहर में सरे – आम, कत्ले – आम कर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तमन्ना


सुबह तो हो जाती है तुम्हारी आँखों से,
ना जाने कब रात होगी तुम्हारी जुल्फों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सौभाग्य


खूबसूरत जिस्म पे कभी उनके,
मेरा भी हाथ था.
अब कहती हैं,
क्या ये मेरा कम सौभाग्य था.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हर रात बदल जाता है खाट उनका


मेरा दिल तोड़कर,
उनका अंदाज देखिये,
सारे शहर में हैं अब जलसा उनका।
बहुत खूबसूरत हैं,
ये ही, नाज है उन्हें,
हर रात बदल जाता है खाट उनका।

 

परमीत सिंह धुरंधर