वक्षों की आस


बाहर बादलों की भीड़ हैं प्रिये,
बरस रहें हैं द्वार पे, वो नित प्रिये।
तुम वहाँ गावं में, हम यहाँ परदेश में,
प्रीत में ये कैसी रीत हैं प्रिये।
लाता हूँ रोज फूलों को, जुल्फों की तेरे याद में,
दीपक भी जलाता हूँ, तेरे मुखड़े की आभा में.
तुम चूल्हा-चौकी पे, हम लम्बी रातों में.
विरहा के ये कैसे गीत हैं प्रिये।
ओठों की लाली हम नहीं चख पाए,
आँखों के काजल हम नहीं सोंख पाए,
ना पतली कमर पे हाथ ही फेर पाए.
तुम सीने में दबाए, हम वक्षों की आस लगाए,
जीवन की ये कैसी पीर है प्रिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

These lines describe when husband is in city and his wife is in village. They have not spend quality time after marriage as her husband had to go for job. He is missing his wife as it is raining outside. So he is trying to imagine her face and her beauty. This was situation during 1970-2000, not now.

ग़ालिब बना दिया


जिंदगी के शौक ने काफिर बना दिया,
मजनू बनने चले थे, ग़ालिब बना दिया।
इस कदर उनके ओठों की तलब हुई,
भरी जवानी में ही शराबी बना दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मांसपेशियां कभी – कभी अकड़ जाती है


मौसम को सम्भाल मेरे दोस्त,
ओठों से कुछ ज्यादा ही,
बढ़ रही हैं तेरे नजदीकियां।
थके, हारे, गिरे इस मर्द पे,
ना कर तू ऐसी मेहरबानियाँ।
मैं भी कभी शिकारी था, मगर,
आँखों की रौशनी, अब कुछ धुंधली है,
मांसपेशियां भी कभी – कभी अकड़ जाती है.
तो ना बिछा यूँ मुझपे, रोज – रोज,
शतरंज की बाजियां।
क्योंकि,
दिमाग अब भी वो ही शातिर है,
तो ए दोस्त,
न जगा इसे, यूँ गिरा – गिरा के बिजलियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

ग़ालिब बना दिया


जिंदगी के शौक ने काफिर बन दिया,
मजनू बनने चला था, ग़ालिब बना दिया।
हुस्न वालो की शहर में होता है,
चर्चा मेरा एक बेवकूफ के रूप में.
क्यों की मैंने उनको,
उन्हीं का आइना दिखा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तीनो बदमाश एक साथ है


एक है खत्री, और एक आफताब है,
दोनों के आँखों में मेरा ही ख्वाब हैं.
तो कैसे सम्भालूँ जोबन रसिया,
Crassa के मुंह से भी टपकsता लार है.
एक ही बार में टूट जाते है,
चोली के सारे बटन मेरे.
ऐसा इनकी आँखों का कमाल है.
तो कैसे सम्भालूँ चुनर रसिया,
जब तीनो बदमाश एक साथ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आईने में उनको सजते – सवरते


उम्र के फैसले बदल – बदल कर,
निगाहों से देखतें हैं तरस -तरस कर.
आईने में उनको सजते – सवरते,
गलियों में उनको निकलते- मचलते।
मोहब्बत का दर्द सहते – सहते,
देखते हैं गैरों को बस्ते यहाँ।
दंश बेवफाई का कुछ ऐसे मिला की,
जीवन रह गया हाथ मलते – मलते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रिश्ते भी इन आँखों के काले हैं


तेरी आँखे ही काली नहीं, ए दिलरुबा,
रिश्ते भी इन आँखों के काले हैं.
जो भी डूबा हैं इन आँखों की मस्तियों में,
आज तक रो रहे उसके घरवाले हैं.
तेरी राते भीं जगमग करती हैं,
और उनके दिन भी जैसे गहरे अंधियारे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहाँ – कहाँ है तिल?


कस के पकड़ लो तुम बालम जी,
मेरी बाहों को.
मेरा मन भटक रहा है,
देख नजारों को.
देखो जरा मेरी कमर को,
कहाँ – कहाँ है तिल?
कब तक रखोगे?
यूँ बस, ओठों पे ओठों को.
क्या – क्या अरमान,
लेके आईं मैं मायके से?
कब तक यूँ जलाओगे?
तुम काठ की हांडी को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी चढ़ती है सबकी


कोई निगाहें रखता है,
कोई इसारे रखता है.
जवानी चढ़ती है सबकी,
मगर, कोई – कोई ही,
सूरत पे सीरत रखता है.
कोई पीले दुप्पटे में,
कोई नीले दुप्पटे में.
मिल जाती हैं कई,
रोज गली – मोहल्ले में.
कोई मुस्कान रखता है,
कोई जुबान रखता है.
मगर, कोई – कोई ही,
दुप्पटे में जज्बात रखता है.
कोई मेहँदी लगा के,
कोई हल्दी लगा के.
रोज चलते हैं सभी,
अपने तन को सजा के.
मगर, कोई – कोई ही,
इस सजे तन के अंदर,
मीठा मन रखता हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत नागिनों का है आभूषण दोस्तों


मोहब्बत नागिनों का है आभूषण दोस्तों,
इन अधरों के पीछे छुपा है गरल दोस्तों।
त्वचा है, निसंदेह इनकी बहुत ही मुलायम,
पर अंदर का दिल, है कठोर दोस्तों।
कितने रोएं हैं काँधे पे सर रख के मेरे,
और कितनों ने मिटाया है अपना जीवन दोस्तों।
नागिन कल भी डसती थी, नागिन कल भी डसेगी,
चाहे जितना भी उनको पिला लो शहद दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर