बुद्धिजीवियों की कलम


औरत को देखा मैंने,
बाजार में बिकते हुए.
परुषों को देखा,
उसको खरीदते और नोचते हुए.
दिल मेरा भी भर उठा,
इन परुषों के खिलाफ।
तभी मैंने देखा, एक औरत को,
हँसते और रुपयों को दबाते हुए.
उत्तर से दक्षिण,
पूरब से पश्छिम,
भारत घूम कर लौटा।
कहीं भी न मिला,
ठाकुरों का जुल्म,
न दलितों का शोषण।
तब से उलझन में डूबा है दिल,
क्यों, बुद्धिजीवियों की कलम,
इस बोझ से दबी हैं?
क्यों, उनका लेख अब भी,
समानता के नाम पे,
ये जहर उगलती है?
क्यों, याद हैं उन्हें?
आज भी, गोडसे की गोली,
और गांधी की शहदात।
और भूल गए वो,
गुरु अर्जुन देव पे,
जहांगीर की वो क़यामत।

परमीत सिंह धुरंधर