मासिक -माहवारी


हम ही खगचर, हम ही नभचर
हमसे ही धरती और गगन
हम है भारत की संतान, मगर
भारत को ही नहीं है खबर हमारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

बाँध – बाँध के तन को अपने
काट – काट के पत्थर – पाषाण को
सौंदर्य दिया है जिस रूप को
उसके ही आँगन से निकाले गए,
जैसे मासिक -माहवारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

समझा जिनको बंधू – सखा
उन्होंने ना सिर्फ मुख मोड़ा
हथिया गए धीरे – धीरे, मेरी किस्मत,
तिजोरी, और रोटी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

सत्ता भी मौन खड़ी है, भीष्म – द्रोण, कर्ण सा
निर्वस्त्र करने को हमारी पत्नी, बहू और बेटी
रह गया है बाकी
अब केवल कुरुक्षेत्र की तैयारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

परमीत सिंह धुरंधर 

बिहारी


मन का बिहारी
तन का बिहारी
हारा है कब, बताओ?
जब तक है लाठी हाथों में
किसने पछाड़ा, बताओ?

हम जो उगा दे वो बंजर पे फूल
हम मिटा दे चाहे पत्थर या शूल
भोलेनाथ के सिवा
कहीं सर झुकाया तो बताओ।
मारिसस भी जाके
छपरा को भुलाया तो बताओ।

वो ले गए सोना
वो ले गए चांदी
काले पीतल को
सोना न बनाया तो बताओ।
उलझनों से कभी मुख चुराया
तो बताओ।

परमीत सिंह धुरंधर

लालू – राबड़ी


एक लालू – एक राबड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक की चाहत दूजे के गाल की
एक के मुख पे हर पल नाम दूजे की.
युग-युगान्तर की ये जोड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।

एक नहीं, नौ – नौ संतानों का सुख
देख एक दूजे को भूल जाते हर दुःख।
एक अलबेला – एक अलबेली
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक लालू – एक राबड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।

परमीत सिंह धुरंधर