दिया वो ही बुझाते हैं,
जो शर्म का ढिढोंरा पीटते हैं.
जहाँ जमाना चुप हो जाता है,
हम वहाँ अपनी आवाज उठाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
दिया वो ही बुझाते हैं,
जो शर्म का ढिढोंरा पीटते हैं.
जहाँ जमाना चुप हो जाता है,
हम वहाँ अपनी आवाज उठाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर