मैं ख़्वाब देखता हूँ


मैं ख़्वाब देखता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे वृक्षों पे फल नहीं लगते,
फिर भी मैं उनको सींचता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
बागों में अपने मैं आम नहीं,
शीशम लगता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे तालाब की मछलियाँ,
किनारों पे तैरती हैं.
और मैं बीच पानी में,
बंसी डालता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
हर शाम हारता हूँ,
युद्ध जीवन का.
पर नयी सुबह में,
नयी रणभेरी छेड़ता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

तड़का


अभी रात मेरी बाहों में थी,
की सुबहा आके छनकने लगी.
मीठे-मीठे ख़्वाबों में धुरंधर के,
हकीकत का तड़का लगाने लगी.

सल्तनत


इस सल्तनत के,
हम सरदार।
एक दिन होगी,
यहां अपनी सरकार।
लोग कहेंगें हमें,
राजकुमार।
और दिन भर बजायेंगे,
हम सितार।
लगातार-लगातार।
अपनी खेतों में होंगे,
ताड़ के पेड़।
लोगों से रखूँगा,
जी हर के बैर।
भर-भर के थालियां,
खाऊंगा,
भर पेट मछलियाँ।
होम मिनिस्टर से प्राइम मिनिस्टर,
सारे लगाएंगे मेरे बिस्तर।
अपनी सेना में होंगे,
बस छुछुंदर।
अति सुन्दर, अति सुंदर।
सेक्सी साइरन से थैन्डर थाई,
सब बनेंगी बस अपनी लुगाई।
फिर तो परमीत की,
होंगी रोजाना आँखे चार।
बारम्बार-बारम्बार।