गाँधी जी और भगत सिंह


अधिकारों की मांग बस प्रतिकार से नहीं होगा,
प्रहार भी करना होगा उनपे,
उनके मनुहार और गुहार से नहीं होगा।

जो कहते हैं की ये बस गाँधी की देन है,
उन्हें गुलामी और आजादी के फर्क का,
कभी एहसास नहीं होगा।

उन्हें दिखा दो कभी तस्वीरें,
तिब्बत और दलाई लामा की,
फिर उन्हें अहिंसा से आजादी प्राप्ति का,
झूठा अभिमान नहीं होगा।

उन्हें भी एहसास है कहीं – ना – कहीं,
गाँधी जी की इस गलती का,
वरना छोड़ कर सारे क्रांतिकारियों को,
उनके लबों पे भगत सिंह का जय – जयकार नहीं होता।

अधिकारों की मांग बस प्रतिकार से नहीं होगा,
प्रहार भी करना होगा उनपे,
उनके मनुहार और गुहार से नहीं होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सरदार और गाँधी


सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।
हाल वही होता जो हो रहा है तिब्बत का,
बिना इनके बलिदानो के हम आज़ाद होते नहीं।
वो हैं की,
हमारी आज़ादी को अपनी भेंट और हक़ बताते हैं.
ये हैं की अपना सबकुछ लुटा कर भी,
आज तक कुछ भी जताते नहीं, मुह खोला नहीं।
बंटवारा जिन्होंने स्वीकार किया सरहदों का,
अगर वो इतने धर्मनिरपेक्ष थे,
तो इनका ख़याल आया क्यों नहीं?
सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रातों में नेहरू बनना चाहते हैं


ज़माने को गुनाह करने दो-2,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगें।
सिरफिरों में मेरा नाम,
चलने दो.
भगत सिंह की इस धरती पे,
सब लंबा जीना चाहते हैं.
रातों में नेहरू और दिन में,
गांधी बनना चाहते हैं.
वो चालक हैं, चतुर हैं,
सत्ता हथिया लेंगें।
मुझे संघर्ष की राहों का,
लोहिया बनने दो.
लड़कियों का क्या है?
वो इन्हीं से प्रेम करेंगी,
कुवारीं इनके बच्चों की माँ बनेंगी,
और इनके आँगन में हिन् रोयेंगी।
वो कमजोर नहीं, पारंगत हैं,
इस शोषण के खेल में.
उन्हें ये खेल खेलने दो.
सत्ता के खिलाफ नव-विगुल,
बजाने वालों में मेरा नाम रहने दो.
ज़माने को गुनाह करने दो-2,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगें।
सिरफिरों में मेरा नाम,
चलने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर