गाँव छोड़ दी मैंने


इश्क़ करने चले थे
धर्म बीच में आ गया.
मंदिर छोड़ दी मैंने
उनसे मगर चर्च न छूटा।

उन्हें शक था
गाँव के जाहिल लोग
इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगें।
मगर अंत में उनके शहर के लोगों ने
बीच में दीवार चुनवा दिया।
गाँव छोड़ दी मैंने
मगर उनसे शहर न छूटा।

अंत भी इस कदर हुआ
इश्क़ का मेरे
की बेवफाई का हर ठीकरा
मेरे सर ही फूटा।

इश्क़ करने चले थे
धर्म बीच में आ गया.
मंदिर छोड़ दी मैंने
उनसे मगर चर्च न छूटा।

परमीत सिंह धुरंधर

दहेज़ में बैल


बैल मिलल दहेज़ में
अब का बथान चाहता र अ.
अतना सुनर चिड़िया के छोड़के
कहाँ दाना डाल अ ता र अ?

बैल भुखाइल-प्यासल
दिन भर नाद पे
तू कहाँ भूँसा डाल अ ता र अ?
अतना सुनर चिड़िया के छोड़के
कहाँ दाना डाल अ ता र अ?

परमीत सिंह धुरंधर

शहर – गाँव


शहरों में घर नहीं मकान है
बाकी सब जगह बस दूकान हैं
जहाँ बस दौलत ही एक पहचान है.

गाँव में आँगन है, बथान है
खेत है खलिहान है
बाग़ और बागान है
जहाँ झूलते झूले छूते आसमान हैं.

शहरों में रौशनी नहीं
चकाचौंध है.
जिस्म की, फरेब की
हर किसी को रौंद कर
आगे बढ़ने के जिद की.

गाँव में उषा है
गोधूलि बेला है
जुगनू के साथ हाथ मिला कर
अंधेरों से लड़ती दिए की बाती।

शहर में बिन व्याही पतोहि है
बेटी से पहले माँ ने व्याह रचाई है.
एक घर में रह कर भी
सबके बीच गहरी खाई है.

गाँव में सब कुवारी
सबकी बेटी
और बूढी, सबकी माई हैं.
घर छोटा और टूटा – फूटा
पर खाते सब संग
और सबकी संग ही लगती चारपाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की


मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की
मछली और चिकन की थाली में भी
परोसती हैं चोखा, चटनी और खिचड़ी।

मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की
दही -चिउरा पे खिलाती है
पापड, अदौरी – तिलोड़ी।

मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की
दोपहर के खाने में ऑफिस में
भेज देतीं है
सतुआ, आचार और हरी मिर्ची।

परमीत सिंह धुरंधर

वैराग


पल – पल में इरादों का विखंडन होता है
पल – पल में इरादों का सृजन होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

स्वयं जो इस सृस्टि का ब्रह्म है
उस साक्षात् शिव को भी
विष का करना पान होता है.
पल – पल में जीवन का त्रिस्कार होता है
पल – पल में जीवन का अपमान होता है.
जो इनसे परे होकर ना विशलित हो कभी
शिव के समक्ष वही वैराग होता है.

मैं फिर पुलकित होऊंगा ए मेरी शाखाओं
फिर वही पुष्प और फल धारण करूंगा मेरी शाखाओं
की हर पतझड़ के बाद विकसित वसंत होता है.
पल – पल में जीवन का विनाश होता है
पल – पल में जीवन का आरम्भ होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

वो जिस्म में एक दिल रखते हैं


मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

कड़ाके की सर्दी हो
या भीषण गर्मी
बहते हैं दोनों झूम-झूम के.
मेरे तपते पीठ और ठिठुरते जिस्म
की खबर रखते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

मेरे बच्चों की भूख
मेरे परिवार के भविष्य
का ख्याल रखते हैं.
मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

जब तक ना बांध दूँ
दोनों को नाद पे
पहला खाता नहीं है.
और बाँधने के बाद दूसरा
पहले को खाने नहीं देता है.
नित – निरंतर, नाद पे, खूंटे पे
खेत में, बथान में
अपने सींगों को उछाल – उछाल
वो प्रेम की नयी परिभाषा रचते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

खाते हैं घास – फुस
इठला कर, उमंग से
पर नाद में सने नाकों से
घर के पकवानों पे नजर रखते हैं.
अपने हाथों से गृहलक्ष्मी जो ना
उन्हें भोग लगाए
तो फिर नए पकवानो के तलने
और भोग तक उपवास करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

क्यों?


सोचता हूँ बहुत
जब भी वृक्ष को देखता हूँ
क्यों इसकी शाखाओं पे कांटे और फूल दोंनो हैं?

टटोलता हूँ बहुत
अपने अंतर्मन को
क्यों मैं उम्र के साथ दोराहे पे खड़ा हूँ?

हर नया रिश्ता बनाने के बाद
धड़कने मायूस और उदास
क्यों उषा से ज्यादा निशा में चमक है?

जब भी उसे बाहर में सुनता हूँ
भ्रमिक हो जाता हूँ
पतिव्रता के खिलाफ खड़ी
दुनिया की औरतों को नयी रौशनी देती
वो क्यों अपनी बेटी को सावित्री का पाठ पढ़ाती है?

परमीत सिंह धुरंधर

नारी तू


नारी तू अनमोल है
अमूल्य है
इस धरा पे स्वर्ग के
तुल्य है.

तू सजे – संवरे
तो सितार में धुन है.
तू विचरण करे
तो तुझपे प्रकीर्ति स्थिर है.
तेरे दो नयनों में
सागर असीम है.
नारी तू अमूल्य है.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी के किस्से


कुछ जवानी के किस्से ऐसे भी हैं,
अधरों से अधरों तक आते – आते
उम्र गुजर गयी.

संसार में, हर कोई स्वघोषित बाजीगर है
खेलना तो दूर साहब
बस दूसरों पे हंसने में उम्र गुजर गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

ख्वाब


हर ख्वाब के टूटने पर
एक समंदर बनता है.
कोई बहा देता है आँखों से
कोई दिल के अंदर रखता है.

मोहब्बत तो बस एक दरिया है
कोई डूब-डूब के पीता है
और कोई पी – पी के डूबता है.

परमीत सिंह धुरंधर