अब सिंह के साथ सहवास कर लो


अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो,
इस शीतलहर में, उसके नस – नस में,
प्रचंड अग्नि-कुंड जागृत कर दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.

वो उबल – उबल, दहक – धधक,
बिखरे तुम्हारे अंगों पे,
अपने सुगढ़ – सुडौल वक्षो पे,
ऐसा उसे विश्राम दे दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.

भ्रमर के पीछे कब तक भागोगी,
अब सिंह के साथ सहवास कर लो.
देख ले सारा हिन्द इस सत्ता को,
सहचर बनकर ऐसा शंखनाद कर दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे


प्रभु आप जब से जीवन को साकार कर रहे,
रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे.
चक्षुओं को भले प्रभु आपका दर्शन ना मिला हो,
हम साक्षात् ह्रदय से परमानंद का आभास कर रहे.

अद्भुत है आपका अलंकार देवों में,
स्वयं महादेव भी ये बखान कर रहे.
लाड है, प्यार है माँ पार्वती को आपसे,
जग में शक्ति को प्रभु आप स्वयं सम्पूर्ण कर रहे.

मैं भिखारी हूँ, भिक्षुक हूँ दर का प्रभु आपके,
कृपा है प्रभु आप मुझपे नजर रख रहे.
आपके चरण-कमलों में हो मस्तक मेरा भी,
बस इसलिए प्रभु हम आपका नाम जप रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपने कौमार्य को दे कर उसे गजराज कर दो – 2


अपने कौमार्य को दे कर उसे गजराज कर दो,
स्वयं बन कर मेनका उसे इंद्रा का ताज दे दो.
वो हुंकार करे, हर बार करे,
तुम शांत चित हो कर,
अपने यौवन की वीणा को,
उसकी अँगुलियों से झंकृत कर दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लकीरों का जोर


मोहब्बत ने हर तरफ दे अधूरा कर दिया,
जिस शहर के हम शहंशाह थे,
उसी की गलियों में रुस्वा कर गई।
क्या पीना और पिलाना दोस्त,
मेरे हाथ की लकीरों का जोर देख,
दूसरों को दिया तो दवा,
और खुद पे जहर का काम कर गई.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फर्क रखो


उजालों और अंधेरों में कुछ तो फर्क रखो,
कोई हुस्न नहीं हो,
की दिया बुझा के शर्म उतार दूँ.
मैं चुप हूँ तो इसे मेरी मज़बूरी ना समझ,
जख्म बिस्तर के नहीं ये,
जो दिवाली माने लगूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपना कौमार्या दे कर उसे गजराज कर दो


दे दो, अपना सब दे दो,
अगर वो तुम्हारा प्रेम है, प्रेमी है,
तो सब कुछ अपना,
एक रात में ही उसको दे दो.

टुकड़े – टुकड़े में उसे देने से,
ताकि वो वर्षों तक तुमसे बँधा रहे,
अच्छा है, की पहली रात ही,
सब कुछ उसपे लुटा दो,
भले ही फिर वो न समीप आये.

अंगों का कसाव,
वक्षों का पड़ाव दे दो,
अधरों का जाम दे दो.
कमर की लचक,
साँसों की महक दे दो,
चूड़ियों की खनक दे दो.

उसे भिंगो – भिंगो के,
उसे बहका – बहका के,
ये एहसास दे दो,
विश्वास दे दो,
की वो ही तुम्हारा देवता, संसार है,
वो शक्तिशाली और तुम्हारा रक्षक है.
झूठा ही सही, भ्रम ही सही,
मगर उसके आगोस में,
उसके इशारों पे,
बिछ कर उसके चेहरे पे गर्व का दर्प दे दो.

आँखों की मस्तियाँ,
जुल्फों की लड़ियाँ,
जवानी की अंगड़ाइयाँ सब दे दो.
ये सोच कर,
की अब ये रात ना होगी।
ये जानकार,
की तुम कल फिर उसके साथ न होगी।
उसे छलने को नहीं,
खुद को बिका समझकर,
अपने शर्म को छोड़ कर,
बर्षों से बचाये धन को,
दर्पण में स्वयं को निहार – निहार कर,
उसको सम्पूर्ण सौंप दो.

वो दले, कुचले,
चूमे या दन्त – नख से काटे।
वो सवारें, निखारे,
या एक ही रात में निचोड़ कर छोड़ दे.
तुम बेधड़क – बेहिचक,
अपने तन के कपास को,
बिना ज्यादा सोचे – समझे,
क्षण में दूर कर दो.
अपने यौवन की अग्नि को
उसके पौरष के यग में समाहित कर दो.

तुम्हारे जिस्म,
तुम्हारे अंगों की पराकाष्ठा,
तुम्हारे यौवन,
और तुम्हारे औरत होने की सम्पूर्णता,
सब उसके इस विजयगाथा में है.
मर्द का प्रेम केंचुआ सा है,
इधर रोको,
तो उधर की राह में,
मुख मोड़ लेता है.
उसे शिव बन कर,
स्वयं विष धारण कर,
अपने सौंदर्य – अमृत का रसपान दे दो.
उसे मस्त करके,
उसी के बल के गर्व से मदमस्त गजराज कर दो.
अपना कौमार्या दे कर,
उसके मन – मस्तिक को दम्भ दे दो.
शिव सा अपना सर्वस्वा दे कर,
अहंकार से ग्रसित रावण कर दो.

Its dedicated to the poem “The Looking Glass”, written by Kamala Das.

परमीत सिंह धुरंधर

गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है


मधुर तेरी मुस्कुराहट का हमें राज पता है,
गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है.
शीतलहर में तेरा यूँ चलना लचक – लचक,
यूँ इठला – इठला के रुकने,
और मुड़ने का हमें राज पता है,
गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है.

गोरु – पखेरू सब सिथिल पड़े हैं,
बस एक तू ही है जो ज्वाला बनी है.
तेरे अंग – अंग के ज्वार का हमें राज पता है,
गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभिमान – अहंकार


जब पुत्र ही हूँ मैं धुरंधर सिंह का,
तो अभिमान मेरे मस्तक पे है.
और शिष्य ही रहा हूँ जब,
सीताराम – कास्बेकर का,
तो अहंकार मेरे नस – नस में है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलिदान हो – बलिदान हो – 3


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

है अगर भय तुम्हे,
तो खुद से ही आज पूछ लो.
क्या है वो जिंदगी जिसके?
बेड़ियों में पाँव हों.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो रुक जाये वो धारा नहीं,
जो डूब जाए वो किनारा नहीं।
मानव हो तुम कोई पशु नहीं,
जो दर पे किसी के बंध जाए.
वो पौरष नहीं जिसका,
ना स्तुति, ना कोई गान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो भूल गए इतिहास अपना,
उनका कोई वर्तमान नहीं।
वो क्या मांगेंगे हक़ अपना जालिम से?
जिनको अपने लहू का आभास नहीं।
ये समर है उन वीरों का जिनका,
प्राण से बढ़कर मान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बसंत


आज बसंत-पंचमी पे माँ सरस्वती को समर्पित मेरी बसंत पे पहली रचना।

चोली को संभाल गोरी, चोली को संभाल,
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।
खोल ले बटन राजा, खोल ले बटन,
आ गया है बसंत, डाल ले गुलाल।

डालूंगा गोरी तो फिर छोडूंगा नहीं,
फिर मत कहना लागे है तुझे लाज.
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।

मूँद लुंगी आँखे तू डाल ले धीरे से,
बस तोड़ ना देना राजा मेरी चोली का बटन.
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।

 

परमीत सिंह धुरंधर