किताबे खुली रखो,
दिल को बाँध के रखो,
वो अभी – अभी जवान हुई हैं,
उनसे बस रातों का रिस्ता रखो.
वो जितना चाहें,
गीत गाती रहें वफ़ा के.
तुम उनसे अभी,
ना इसकी उम्मीदें रखो.
परमीत सिंह धुरंधर
किताबे खुली रखो,
दिल को बाँध के रखो,
वो अभी – अभी जवान हुई हैं,
उनसे बस रातों का रिस्ता रखो.
वो जितना चाहें,
गीत गाती रहें वफ़ा के.
तुम उनसे अभी,
ना इसकी उम्मीदें रखो.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारा नाम है बरखा,
मेरा काम है बरसना।
तू 46 में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।
मौसम,
तेरे मुस्कुराने से बदलता है,
दिल राइट विंग से,
लेफ्ट विंग में धड़कने लगता है.
तेरा अंदाज है कातिलाना,
मेरा शौक है आजमाना।
तू ४६ में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।
तुम्हारा नाम है बरखा,
मेरा नाम है Crassa।
तू ४६ में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।
परमीत सिंह धुरंधर
जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ताड़ी लोटा से,
तू चोलिये से ताड़ी पीयह।
जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ओठवा से,
तू अंग-अंग से पीयह।
जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई तोड़े पलंग,
तू देवाल के ही ढाहह।
परमीत सिंह धुरंधर
वो वक्ष नहीं,
जो विशाल ना हो.
अनंत तक जिसका,
विस्तार ना हो.
जिसपे क्राससा जैसा भ्रमर,
नितदिन करता रसपान ना हो,
विश्राम ना हो.
ग्रीष्म क्या, शरद ऋतू क्या?
वो वक्ष नहीं,
जिसपे हर क्षण विकसित,
कोई वसंत ना हो.
वो यौवन क्या?
जिसको अपने वक्षों पे गुमान ना हो.
और वो वीर ही क्या?
जिसके जीवन में वक्षों से संग्राम ना हो.
परमीत सिंह धुरंधर
सारा – शहर है मेरी नजर पे फ़िदा,
तुम कैसे बचोगे, कब तक ?
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
ना पिघलूंगा, जब तक ना उतरेगी मेनका।
पत्थर बनके कहीं मिट ना जाओ,
चख लो समंदर का अमृत ज़रा.
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
रचूंगा नया सवर्ग अपना।
ढल जाएगा यौवन, तो हाथ मलना पडेगा,
देख – देख के छलकता गागार यहाँ।
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
अनंत तक चमकूंगा बांके सितारा।
परमीत सिंह धुरंधर
वक्षों पे ही मोक्ष है,
जो प्राप्त कर ले इन्हे,
वो ही वशिष्ठ और अगस्त्य है.
यूँ ही भीष्म ने नहीं रोक लिया था,
अपने तीरों को,
जो वीर हैं, वो उठाते नहीं,
इनपे तीर और तलवार हैं.
जलवाई को नियंत्रित करते,
इस भीषण – प्रचंड शीतलहर में,
ये ही हैं जो धमनियों को निरंतर,
रखते हैं जागृत और उनमे,
रक्त को करते संचारित।
कामुकता नहीं, अध्यात्म का,
बस यही प्रथम और आखिरी पाठ हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
व्याकुल मन को शांत कर दे,
चित को कर दे एकाग्र।
योग – माया क्या है ये जीवन?
वक्ष ये केवल वक्ष नहीं हैं,
ये हैं मोक्ष – अमृत – परमानंद का भण्डार।
हिमालय सा उन्नत ये,
सुसुप्त अवस्था में भी रखते हैं,
समुन्द्र सा ज्वार।
अपूर्व – अन्नत इस ब्रह्माण्ड में,
ये वक्ष ही करते हैं जीवन का संचार।
वक्ष ये केवल वक्ष नहीं हैं,
ये हैं वीरों का अभिमान।
परमीत सिंह धुरंधर
पीया हो गइलन परदेश के गुलाम हो,
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
कट त जाला जेठ और आषाढ़,
पर मोदी जी अकेले ना कटे इ माघ हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
दुआरा – अंगना, खेत – खलिहान,
हम सब कर लेवेनि।
सास – ससुर, गाय – बैल,
हम सब देख लेवेनि।
पर मोदी जी सेजिया के चोट ना सहात हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
परमीत सिंह धुरंधर
एक हाथ की दूरी हो,
साँसों से मेरे तुम महकी हो.
दरिया बनके मुझे डुबोने को,
अंग-अंग से तुम मचली हो.
क्या शर्म और हया?
कुल – मर्यादा सब भूल कर,
यौवन की मदिरा में बहकी हो.
परमीत सिंह धुरंधर
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो,
इस शीतलहर में, उसके नस – नस में,
प्रचंड अग्नि-कुंड जागृत कर दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.
वो उबल – उबल, दहक – धधक,
बिखरे तुम्हारे अंगों पे,
अपने सुगढ़ – सुडौल वक्षो पे,
ऐसा उसे विश्राम दे दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.
भ्रमर के पीछे कब तक भागोगी,
अब सिंह के साथ सहवास कर लो.
देख ले सारा हिन्द इस सत्ता को,
सहचर बनकर ऐसा शंखनाद कर दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.
परमीत सिंह धुरंधर