दिल समझेगा तेरा जिस दिन मुझको
उस रात तू मेरी बाहों में होगी
अरे बन के नवयौवना तू
सेज पे मेरे फिर पिघलेगी।
परमीत सिंह धुरंधर
दिल समझेगा तेरा जिस दिन मुझको
उस रात तू मेरी बाहों में होगी
अरे बन के नवयौवना तू
सेज पे मेरे फिर पिघलेगी।
परमीत सिंह धुरंधर
कुछ आपके करीब से गुजरने का मौक़ा मिले
कुछ आपके पहलु में ठहरने का मौक़ा मिले
कभी निगाहों, कभी बाहों
कभी आपकी जुल्फों से खेलने का कोई मौक़ा मिले
ठहर जाए जिंदगी वो पल बनकर
जिस पल में तुझे अपना कहने का मौक़ा मिले।
परमीत सिंह धुरंधर
तू भी है
राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक
भाला जाए.
जीत – हार तो
श्रीकृष्ण के हाथ है
कब तक जीवन यूँ जीया जाए?
अश्वों को थाम के
उतर जा कुरुक्षेत्र में
कब तक भोग -विलास में
समय बिताया जाए?
माना की तेरे नसीब में
यौवन का सुख नहीं
तू ही बता फिर धरती पे
किसे महाराणा बुलाया जाए?
गर नहीं विश्वास
तुझे ही लहू का
तो फिर कितना तुम्हे?
इतिहास पढ़ाया जाए.
सब हैं अमृत के प्यासे
किसकी प्यास गरल से बुझाई जाए?
प्रचंड-प्रबल वेग से गंगा
आतुर है सृष्टि को मिटाने को
काल को जो बाँध ले
उस महाकाल को क्यों न पुकारा जाए?
जीवन उसी का सार्थक है जग में
युगो -युगो तक जिसका नाम गाया जाए.
परमीत सिंह धुरंधर
First two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.
कण – कण में व्याप्त है श्रीराम
चाहे अयोध्या हो या अंडमान।
मंदिर बने या ना बने
जयकारों में गूँजते रहेंगे श्रीराम।
भूमण्डल के हर कोने – कोने मे
जन – जन के ह्रदय में है श्रीराम।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी उदास थी
तो दोस्तों ने बुला लिया।
बोलें, “थोड़ा मुस्करा परमीत”
तो मैंने ठहाका लगा दिया।
मिले चारों यार मेरे
तो रात भर
वही किस्सों की पुरानी केतली
चूल्हे पे बिठा दिया।
वो बोलें, “थोड़ा कुछ निकाल परमीत”
तो मैंने ठहाका लगा दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
गहन – गहन अध्ययन करके भी
तुम्हारे सौंदर्य से मैं हार गया.
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे अधरों से पान करूँ?
वेद – पुराण पढ़ कर भी
मैं हृदय अपना ना साध पाया।
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे यौवन का रसपान करूँ?
परमीत सिंह धुरंधर
वीर कई धरती पे हुए
पर महराणा सा न कोई वीर हुआ.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।
कोई नहीं था जो
टिक जाता खडग के आगे.
महाराणा ने जिस खडग को
अपने बाजुओं का बल दिया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।
ना नरम बिछोना
ना मदिरा का पान किया।
कतरे – कतरे से लहू के अपने
हमने माँ का श्रृंगार किया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।
महराणा से Crassa तक
सबने है इतिहास रचा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने प्रेम में सबका मान रखा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।
परमीत सिंह धुरंधर
इंसान तेरे क़दमों की बस यही एक कहानी
रुक जाएँ तो, कौन साथ इनका मांगता?
धुप में जो रूप खिले, ऐसा यौवन है वो
शीत के चाँद को कौन आँगन से है देखता?
परमीत सिंह धुरंधर
तुम करुणामयी भक्तवत्सल
तुम धर्म का आधार हो.
सर्वव्यापी, निरंतर, अचर-अगोचर तुम
तुम सनातन साकार हो.
मैं मुर्ख -अज्ञानी – पापी
मुझे क्षमा करो, मेरा उधार हो.
सृष्टि के आदिकर्ता, पालक – संहारक तुम
तुम ब्रह्म निराकार हो.
जीव – अजीव सब तुममे समाहित
तुम कण – कण में विराजमान हो.
परमीत सिंह धुरंधर