योगी जी के सरकार बा


तहरे कमर के बल पे, योगी जी के राज बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे रख दी तहरा पे हाथ हाँ.
त घुघंट उठा के चल अ, जोबन उछाल के चल अ,
मन करे त, अब लहंगा उठा के चल अ.
तहरे नजर के तीर पे, गिर गईल सरकार अखिलेश के,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे छू दी तहार एगो केश हाँ.
त पयाल बजा के चल अ, कंगन खनका के चल अ,
मन करे त, अब चोली से चुनर गिरा के चल अ.
तहरे जोबन के जोर पे योगी जी के सरकार बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे मुँह खोली तहरा खिलाफ हाँ.
तहरे कमर के बल पे, योगी जी के राज बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे रख दी तहरा पे हाथ हाँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चरचराये खटिया और चुये पलानी


अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।
आरा, छपरा से बलिया तक,
तहरे किस्सा, तहरे कहानी।
बलखाये अइसन तहार कमर,
की पुरवा में उठे पछुआ के लहर.
दिल्ली छोड़ के तहरे खातिर,
दुआर ओगरतानी।
जहिया कह देबू, घर से उठालेम,
मर्द अइसन हइन,
जेकर अभियों बाटे खाटी पानी।
अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे ह्रदय में एक दरिंदा धड़कता है


मुझसे मत पूछो यारों,
मेरे पास दिल है की नहीं।
दिल तो कब का टूट गया २००३ में,
अब तो मेरे ह्रदय में,
एक दरिंदा धड़कता है.
अब मौका मिले तो,
दबोच लूँ, खरोंच दूँ.
कहीं दन्त, तो कहीं नख के,
निशान छोड़ दूँ.
अश्रुओं की धारा में,
मैं भी उसकी मोहब्बत को,
तड़पती, विलखती,
चीत्कारती छोड़ दूँ.
मेरी मोहब्बत को जब,
उसने तार-तार किया चौराहे पे.
तब से मेरे मनो-मस्तिक में,
ये नंगापन बस गया है.
और मेरी हसरतों में,
अब बस सिर्फ हवस-ही-हवस है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता


पाकर हुस्न को, इतराना छोड़ दो.
वफ़ा और हुस्न का, कभी साथ नहीं होता।
जितनी भी राते, चाहे साथ गुजार लो
ह्रदय में हुस्न के, कभी एक समय,
कोई एक नहीं होता।

वही मेनका, वो ही शकुंतला,
हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता।
नस-नस में इनके मक्कारी है भरी,
इनके चेहरे से ये नकाब नहीं गिरता।
जब दिल टुटा मेरा तब मैंने जाना,
क्यों हुस्न पे किसी का एतबार नहीं होता?

 

परमीत सिंह धुरंधर

क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का आशीर्वाद प्राप्त है मुझे


बस गगन के वास्ते हो राहें मेरी,
फिर चाहे आमवस्या में हो या राहें पूर्णिमा में।
उम्र भर चाहे ठोकरों में रहूँ, कोई गम नहीं,
मगर मंजिलें मेरी राहों की हो आसमाँ में।
तारें चाहें तो छुप लें,
चाँद चाहे तो अपनी रौशनी समेट ले.
हो प्रथम स्वागत चाहे अन्धकार में मेरा,
मगर प्रथम चुम्बन उषा का हो आसमाँ में.
पाला -पोसा गया हूँ छत्रसाया में धुरंधरों के,
तो क्यों ना अभिमान हो मुझे?
लहू तो सभी का लाल है यहाँ,
मगर एक इतिहास खड़ा है मेरे पीछे।
यूँ ही नहीं तेज व्याप्त है मेरे ललाट और भाल पे,
क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का
आशीर्वाद प्राप्त है मुझे।
मेरा अपमान क्या और सम्मान क्या भीड़ में?
जब तक मेरे तीरों का लक्ष्यभेदन हैं आसमाँ में.
अंक और केसुओं की चाहत में रेंगते हैं कीड़े भी,
फिर मैं क्या और और अफ़सोस क्यों ?
जब तक लहराता है मेरा विजय-पताका आसमाँ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Sitaramam के चेले हैं


Sitaramam के चेले हैं,
मत समझों की थकेले हैं.
धुंआधार बारिस में भी,
बिना छतरी के निकले हैं.
Alberts -Lodish की किताबों में,
Ramachandran plot पढ़ जाते थे.
Hitachi Spectrophotometer पे रखके,
DNA जेल दौड़ाते थे.
सुरेश, नाटू, गणेश, गलांडे के,
रेट-रटाये तोते हैं.
Sitaramam के चेले हैं,
मत समझों की थकेले हैं.
Simple -Simple theorem को,
complex कर के बताते हैं.
सुलझी हुई जिंदगी को,
कठिन -उलझा के रखते हैं.
शौक से Science में आएं हैं.
शौक से Science करते हैं.
Sitaramam के चेले हैं,
मत समझों की थकेले हैं.

In the memory of Prof. Sitaramam, University of Pune.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ तुम देवों की देव हो


माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.
जब तुम ही हो मेरे साथ, किसको पूजूँ, किसको धयाऊं?
पुत्र ही जब तुम्हारा हूँ, फिर और क्या पुण्य कमाऊं?
बस तुम्हारा आशीष ही माँ, मेरा ब्रह्मास्त्र, मेरा कवच – कुंडल है.
माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शहंशाये-हिन्द


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तुमसे इश्क़ करके,
हम नादान बन गए.
तुम सुरमा लगाने लगे,
हम धुंआ उड़ाने लगे.

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बस शिव ही अनन्त हैं


शिव तो अजर हैं,
शिव तो अमर हैं.
शिव के समक्ष कोई तो नहीं,
जो प्रखर है.
शिव के समुख,
सब भेद मिट जाता है.
अमृत-विष, शिव के समक्ष,
सब एक सामान हैं.
शिव तो प्रचंड हैं,
शिव तो अखंड है.
काम को भस्म किया,
काल को अधीन किया।
कैलाश पे विराजकर,
धरती को सुशोभित किया।
शिव ही नृत्य हैं,
शिव ही संगीत हैं.
समस्त सृष्टि में कोई तो नहीं,
जो ना शिव के अधीन है.
शिव तो आदि हैं,
शिव ही अंत हैं.
सम्पूर्ण सृष्टि में,
बस शिव ही अनन्त हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शिव ने कंठ के अधीन किया


अमृत के लालच में समुन्द्र का मंथन हुआ,
प्रकट हुआ जब गरल,
तो बल के साथ लोभ का भी अंत हुआ.
सुर क्या, असुर क्या,
मंदराचल और सर्पराज बासुकी,
का मन भी भयक्रांत हुआ.
मच गया हाहाकार,
मिट गया हर एक भेद-भाव,
छोड़ कर अमरत्व,
सब ने सिर्फ जीवन को बचाने का प्रयत्न किया।
पशु-पक्षी, और वृक्ष,
कट – कट, कर गिरने लगे,
ताल -तलैया, नदी -सागर,
सबको गरल ने सोंख लिया।
जब शिव के आँगन में,
कोई और काल बन,
जीवन के मस्तक पे, तांडव का आरम्भ किया।
तो शिव ने खोल दी आँखे,
और महाकाल बनकर,
उस कालरूपी – गरल को,
अपने कंठ के अधीन किया।

 

परमीत सिंह धुरंधर