जीवन क्या है?


जीवन क्या है?
नदी है, तालाब है,
धारा है, किनारा है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर बहते रहना,
चाहे अपने किनारे ही डूब जाएं,
सागर से मिलने से पहले,
अपनी सारी लहरे सुख जाएँ।

जीवन क्या है?
सत्ता है, समाज है,
सुख है, विलास है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरन्तर त्याग करते रहना,
हर दुःख के बावजूद, दूसरों के दुःख,
को मिटाने का प्रयास करते रहना।

जीवन क्या है?
सूरज है, चाँद है,
आसमान है, या तारे हैं.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर अन्धकार को मिटाने का,
और प्रकाश को फैलाने का प्रयास करना।
जब तक सबके आँगन में रौशनी न पड़े,
जलते रहना, जल कर दूसरों का अन्धकार हरना।

जीवन क्या है?
ज्ञान है, विज्ञान है,
संम्मान है, संस्कार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर सहयोग करना,
पशु बन कर, गुरु बनकर,
सहयोगी बनकर।

जीवन क्या है?
उल्लास है, उत्साह है,
उत्तजेना है, उपकार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर प्रयास करना,
खोज करना की हम किसी के काम आ सके.

जीवन क्या है?
वेद है, उपनिषद है,
गीता है, धर्म है.
कुछ नहीं।
जीवन हैं निरंतर प्रेम करना,
पशुओं के जीवन को भी जीवन समझना।
उनके आँसुंओं के पीछे के दर्द को समझना।

जीवन क्या है?
उत्थान है, उद्भव है,
उन्नति है, उद्देश्य है.
कुछ नहीं।
जीवन है सिर्फ नारी ही नहीं,
हर मादा का संम्मान करना।
उनके परिवार, उनके मातृत्व को समझाना।

जीवन क्या है?
होली है, दीवाली है,
ईद है, लोहरी है.
कुछ नहीं।
जीवन है हर बुराई को मिटाना,
सभयता के नाम पे, धर्म के नाम पे,
ना सताना, ना बांधना और ना रुलाना।
सती-प्रथा, बाल-विवाह की तरह,
जालिकुट्टी और आमानवीय सभ्यताओं का विरोध करना,
त्याग करना, प्रतिकार करना, बहिष्कार करना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इंसान


इंसान को इंसान का, बस चाहिए यहाँ साथ,
फिर क्या वक्त अच्छा, और क्या है वक्त ख़राब?
पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, सब है इसके बाद.
धन-दौलत, कर्म-ज्ञान, बिन इसके सब है बेकार।
इंसान को इंसान का, बस चाहिए यहाँ साथ.
फिर क्या वक्त अच्छा, और क्या है वक्त ख़राब?

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिया


पर्वतों के शिखर पे बादलों का तांडव है,
सागर की लहरों पे हवाओं का बर्चस्व है.
बस एक दिया ही है,
जो जल उठता है अँधेरा मिटाने को.
चाहे आँधियों कैसा भी दौर हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

विखंडित अक्स


उदास मन,
निराश हो जाता है,
कितनी जल्दी।
मैं भूल नहीं पाता,
उन काँटों को,
जिन्होंने मुझे रुलाया चुभकर.

जवानी की दहलीज़ पे,
तूने एहसास कराया खूबसूरती का.
मगर फिर तूने,
ऐसे तोडा भी इस दिल को,
आज तक उम्मीदों का दामन,
मैंने फिर पकड़ा नहीं।

दिल टूट जाने के बाद,
दिए कितने भी जला लो दिवाली के,
रौशनी नहीं मिलती।
सफलता के हर मोड़ पे,
एक दर्द आ ही जाता है.
वो असफलता और उसका दंश,
किसी सफलता से नहीं मिटती।

मैं कहीं भी छुप लूँ,
किसी के आगोस में.
वो नशा, वो सुकून,
अब कहाँ।
सच कहाँ है किसी ने,
दर्पण के टूटने से अपना ही,
अक्स विखंडित हो जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पहले विष तो पी लूँ शिव सा


शीशम के दस गाछ लगा दूँ,
दो बैल बाँध दूँ नाद पे.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
रधुकुल में भगीरत हुए,
गंगा को धरती पे लाने को.
जैसे भीष्म हुए बस,
गंगापुत्र  कहलाने को.
मैं भी धरा पे एक धारा बहा दूँ,
जो सींचते रहे मेरी गुलशन को.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
मेरा लक्ष्य नहीं जो,
साधित हो आसानी से.
वो भी नहीं जिसके पथ के,
असंख्य गामी हो.
पुत्र ही हूँ धुरंधर का,
हर क्षण -क्षण में एक कुरुक्षेत्र है.
पहले विष तो पी लूँ शिव सा,
जग को जीवन -अमृत दे के.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मानव का मूल्य


समुद्र की उठती लहरे,
भी क्रंदन से कम्पित हैं,
दूसरों का लक्ष्य मिटाती ये,
खुद अपने लक्ष्य से भ्रमित हैं.

भयंकर गर्जना करती,
हृदय में सबके,
भय को प्रवाहित करती ये,
स्वयम ही भय से ग्रसित हैं.

यह बिडम्बना हैं,
या समय का प्रवाह,
अथाह, अपार,
सम्पदा से सुशोभित ये,
मूर्खों की संगती में उत्तेजित हैं.

अहंकार है यह,
या चक्छुवों का,
सूर्य -प्रकाश में निर्बल होना,
या भाग्य ही हैं,
इन विशाल- बलवान लहरों का,
चाहे राम के बाण हो, या कृष्णा के पग
हर जनम में मानव से, ये पराजित है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सेना की नौकरी


मैं तुम्हारे लिए,
आसमाँ के आंसू लाया हूँ,
और,
सरहद पर के कुछ गोलियाँ लाया हूँ.
सीने पे मेरे जो जख्म हैं,
उन्हें अब तक रख के जिन्दा,
लाया हूँ.
मैंने राते काटी हैं,
बस पानी पी – पी के.
और भूख को जिस्म में,
छुपा के लाया हूँ.
दाल में मिले कंकड़ों को सहेजा है,
आज तक तुम्हारे लिए.
और खेत हुए दुश्मनों की,
लंबी सूचि लाया हूँ.
सरकार के दिए वेतन,
में से कुछ नहीं बचा पाया तुम्हारे लिए.
दुःख है, मगर इसके सिवा,
मैं तुम्हारे लिए, सेना की नौकरी से,
सब कुछ लाया हूँ.

This is written for Indian army man from BSF who recently claimed that his officers are not giving him good food. Its painful for me to see the bad treatment our army mans are facing.

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे धूप


रातों को ढल जाने दो,
सुबह को सीने में पल जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरे तन पे ये धूप गिर जाने दो.
तुम मेरी कमर जब पकड़ते हो,
मैं कैसे फिर सोऊँ?
तुम्हारी उँगलियों के रहते मेरी जुल्फों में,
मैं कैसे अपनी आँखों में नींद लाऊं?
तुम ये रातों का दीप, पूरा जल जाने दो,
ये चाँद -तारे, उषा के आँचल में छुप जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरी वक्षों पे भी थोड़ी ये धूप गिर जाने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कॉफी की एक चुस्की


जिंदगी में बहुत गम है,
कभी तुम मुस्कराओ, कभी हम मुस्करा लें.
माना की हम जीवन भर साथ नहीं रह सकते,
माना की हम जीवन भर साथ चल नहीं सकते।
पर कुछ और नहीं,
आवो कभी, इन ठंढी रातों में,
कॉफी की एक चुस्की ही साथ ले लें.
जिंदगी में बहुत काम है,
कभी तुम हाल पूछ लो मेरा, कभी हम तुम्हारा हाल पूछ लें.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपनी नजरों का एक सहारा तो दे दे


महबूब मेरे,
मुझे कुछ तो चैन दे दे.
बैचैन सी हैं जिंदगी,
इसे कभी तो आराम दे दे.
तन्हाइयों में जो हैं,
ये सब कुछ बिखरा हुआ.
इन्हें कभी तो समेट कर,
अपनी संदूक में कहीं छुपा ले.
जिंदगी की उलझने मेरी,
मुझसे सुलझती ही नहीं।
तू कभी दूर से ही सही मगर,
अपनी नजरों का एक सहारा तो दे दे.
प्यासा सावन क्या बरसे किसी पे?
तू उसे अपनी जुल्फों की कुछ बुँदे दे दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर