इश्क़


तुमसे इश्क़ हुआ तो ज़माने को समझने लगे.
तुम्हारे पीछे है अब जमाना, मुझे लगाने को ठिकाने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम


प्रेम वही जिसमे मिलान हो,
विछोह तो गाय से बछड़े का होता है.
अभी मुख से स्तन छूट भी नहीं,
और खूंटे से इनको बंधन होता है.
प्रेम, वही, जिसमे ओठों से रसपान हो,
विछोह में तो मीरा को विषपान होता है.
अभी विरह में ह्रदय जी भर के रोया भी नहीं,
और मीरा को जग से जाना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


समुन्द्रों को बचा के रखो अपने,
इश्क़ में सबको रोना होता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम अब जावां हो गयी हो


समुन्द्रों में अब तो, उठा दो लहरें,
तुम अब जावां हो गयी हो, बिखर दो ये जुल्फें।
तुम्हारा शर्माना माना की बहुत ही जायज है,
पर कभी तो बेशर्म बन कर, उठा दो ये पलकें।
कब तक काजल से ढकोगी खवाबों को सुला के,
कभी तो जिला दो इन्हें गिराके सब दीवारें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक भीड़ लगा जाऊँगा


मैं धरती पे नहीं आया हूँ, मिटटी में बस मिल जाने को,
धरती का सीना फाड़ कर, कोई फसल खिला जाऊँगा।
बादल, दरिया, सब भले बैरी बन जाएँ,
तब भी फूल न सही, बबूल ही बसा जाऊँगा।
दर्जनों की भीड़ बैठती है बस शिकायतें करने को,
मैं तन्हा ही सही अपनी राहों में, पर एक भीड़ लगा जाऊँगा।
बहुत दूर तक चला हूँ, तन्हाई को ढ़ोते-ढ़ोते,
जब भी बैठूंगा कहीं, इनको सुलगा जाऊँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दोहरापन


तुम्हारा रूप देख, सूरज तपता है,
मगर तुम्हारी जिस्म को बस चाँद छूता हैं.
नहीं चाहिए वो हुस्न मुझे,
जिसकी जवानी उसपे ये दोहरापन लाता है.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न की नियत


हम इकिस्वी शताब्दी में आ गए,
उनको शिक्षा मिली,
उनको अधिकार मिले,
नारी आज चाँद पे पहुँच गयी.
पर हुस्न की नियत पे हम क्या लिखे?
आज भी दस-दस पुत्रियों के,
माता-पिता नहीं चाहते की,
उनका पुत्र,
किसी लड़की के प्रेम में पड़े.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बुढ़ापे का चिराग


जो इंसान,
परेशान है सारे शहर में.
शायद वो किसी का,
बाप हैं.
शायद उसका पुत्र,
पड़ गया है किसी के इश्क़ में.
और उसके बुढ़ापे का,
वो एक ही चिराग है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शमा के आगोस में


समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर