दिल-शहर में, हमसे पूछो तुम,
कितनों के मकानों में, तुम बस गए हो.
झुकी – झुकी निगाहों से अपने,
पुराने -नए, सब दरख्तों में सुराख कर गए हो.
परिंदे जिन्हें पसंद हैं, आसमा की उड़ान,
उन्हें भी जमीन पे चमन दिखा गए हो.
परमीत सिंह धुरंधर
दिल-शहर में, हमसे पूछो तुम,
कितनों के मकानों में, तुम बस गए हो.
झुकी – झुकी निगाहों से अपने,
पुराने -नए, सब दरख्तों में सुराख कर गए हो.
परिंदे जिन्हें पसंद हैं, आसमा की उड़ान,
उन्हें भी जमीन पे चमन दिखा गए हो.
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत कम होते हैं,
जिन्हें अपने शहर में,
मिलता है मौक़ा -इश्क़ का.
आपने वहां शिविर डाला है,
जो शहर ही है, मेरे इश्क़ का.
परमीत सिंह धुरंधर