चाँद को सितारों में
कौन लाया है?
चलो, मिलकर बुलाते हैं.
ये शहर सबका है
इसे अपना कौन समझता है?
चलो, मिलकर पूछते हैं.
जवानी भी अब
मजहबी हो गयी है.
मगर, दूध सफ़ेद ही है.
चलो, मिलकर मिलावट करते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
चाँद को सितारों में
कौन लाया है?
चलो, मिलकर बुलाते हैं.
ये शहर सबका है
इसे अपना कौन समझता है?
चलो, मिलकर पूछते हैं.
जवानी भी अब
मजहबी हो गयी है.
मगर, दूध सफ़ेद ही है.
चलो, मिलकर मिलावट करते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
धुप में छाँव के जरुरत होती है
जितना पीता हूँ, प्यास उतनी बढ़ती है.
दिल अब भी तेरी यादो में है
जितना भूलता हूँ, याद उतनी आती है.
परमीत सिंह धुरंधर
जल-थल के बिना, नभ का क्या अस्तित्व है
मेरी प्यास ही, तुम्हारा स्त्रीत्व है.
परमीत सिंह धुरंधर
हर तरफ है धुंआ – धुंआ, हर तरफ एक आग है
वोट देना है देश के लिए, यही आज की माँग है.
जिसने भेजा है उनको मंदिर-मंदिर, गुरुद्वारे
ये वही हैं जिन्होंने हिन्दू को कहा आतंकवाद है.
माँग रहे है वो स्मृति से हर पल उसकी शिक्षा का प्रमाण
जिनका हर प्रमाण -पत्र एक जालसाजी का निशान है.
हर चेहरा है कालिख से धुला, हर दामन में दाग है
वोट देना है देश के लिए, यही आज की माँग है.
परमीत सिंह धुरंधर
विशाल देह, विशाल कर्ण, विशाल नयन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
महादेव के लाडले, गौरी – नंदन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
आपके चरण-कमलों से बढ़कर नहीं कोई बंदन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
सफल करो मेरे प्रभु अब मेरा भी जीवन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
नित ध्यायु आपको, करूँ आपका ही श्रवण
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
मैं पापी, मुर्ख, अज्ञानी, जाऊं तो जाऊं किसके अब शरण
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
बस जाओ, हे प्रभु, अब मेरे ही आँगन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
सुबह-शाम पखारूँ मैं आपके चरण
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।
परमीत सिंह धुरंधर
जो मिले हैं, उनको प्यार करो
जो बिछुड़ गए, उन्हें याद करो
तुम मानव हो, बिना बिचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर प्रयास करो.
तुम देव नहीं, जो भोग मिलेगा
तुम पशु नहीं जो स्वछन्द विचरण करेगा
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर अभियान करो.
पथ में कुछ छाले मिलेंगें
पथ में कुछ कांटे भी मिलेंगे
सुन्दर अप्सराएं कभी,
दिखलायेंगी अपनी अदायें
तुम अपने ह्रदय से अब
माया-मिलन-मोह का त्याग करो.
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर हुंकार भरो.
क्या है नारी के देह में?
और क्या है उसके वक्षों पे?
कौन है सुन्दर वो नारी जो?
गृहणी बनकर संतुस्ट हुई
और कौन तृप्त हुई?
भला नगर-वधु बनकर।
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, भीष्म सा त्याग करो.
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे छोड़ गए बलमा
एक प्यास जगाकर।
सुलगती रही सारी रात
मैं एक आस लगाकर।
काजल भी न बहा
न टुटा ही गजरा।
उड़ गया वो भौंरा
अपनी जात बताकर।
कोई संदेसा पीठा दो
उस हरजाई Crassa को.
न ऐसे छले
हाय, दिल लगाकर।
जाने क्या मिलता है
छपरा की बैठकी में.
की भूल गए तुम हमें
अपनी लुगाई बनाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी मोहब्बत का समंदर
बस पिता के नाम से आरम्भ
और पिता के नाम पे
जिसका अंत होता है.
जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
अनंत तक शिव, शिव
और बस शिव का नाम होता है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे नैनों के बस दो तीर चले थे
और लोट गया चरणों में वो सिकंदर।
सुना था बड़ा वीर है Crassa
समझता है जो खुद को कलंदर।
बस चोली के दो बटन ही खोले थे
और फंस गया वो छपरा का धुरंधर।
परमीत सिंह धुरंधर
वसुंधरा पे वीर वही,
जो नित्य – नया प्रमाण दे.
हिन्द की इस धरती पे,
नरेंद्र फिर तुम्हारा राज हो.
एक नए युग का उदय हुआ,
जब नरसिंह तख़्त पे विराज हुए.
जागी फिर सोइ भारत की आत्मा
जब नरेंद्र तुम दहाड़ उठे.
हिन्द की इस धरती पे
फिर से वही दहाड़ हो.
हिन्द की इस धरती पे,
नरेंद्र फिर तुम्हारा राज हो.
परमीत सिंह धुरंधर