दबा देना तुम पाँव माँ का


आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.

आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

परमीत सिंह धुरंधर

चोली भी एक बोझ है


तन्हा – तन्हा मेरी जवानी पे
चोली भी एक बोझ है.
सखी, पोखर के इस पानी में
कहाँ मिटता जोवन का ताप है?

कोई भिजा दे संदेसा
उस अनाड़ी, निर्मोही, वैरागी Crassa को
उसकी जोगन पनघट पे
आज भी देखती उसकी राह है.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरहिया कहके भूत भगाते है


हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जिसके लाल धुरंधर कहलाते है.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जो होंसलो से अपने बाँध, समंदर लेते हैं.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ के बूढ़े भी विद्रोही बन जाते हैं.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ के साधू छपरहिया कहके भूत भगाते है.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ गुरु – गोविन्द सिंह जी धर्म की बिगुल बजाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला


जब – जब कोयलिया कुहके बाग़ में
मन में हुक उठे ला.

दू गो हमार नैना राजा जी
विरह में पोखर पे सांझ ढले ला.

छोड़ दी शहर के कमाई
चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा के धुरंधर


ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

परमीत सिंह धुरंधर

हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?


तीक्ष्ण नैनों के बाण चलाकर
मृग-लोचन से मदिरा छलकाकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

नितम्बों पे वेणी लहराकर
वक्षों पे लटों को बिखराकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

शर्म-हया-लज्जा में अटखेली घोलकर
नवयौवन के रस में मादक पलकों के पट खोलकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

जोबन के दंश को सहकर
सुडोल अंगों को आँचल में सहेजकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

ह्रदय में मिलान की तस्वीर सजोंकर
विरह में प्रिय के जलकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

मेरे ह्रदय की गति को बढ़ाकर
वो तरुणी अपनी संचित मुस्कान बिखेरकर
बोली, “हे पथिक, किस पथ के गामी हो?”

परमीत सिंह धुरंधर


मदिरालय की अप्सराओं में


पनघट पे जो प्रेम मिला, वो कहाँ है इन मयखानों में?
सारा मेरा सागर सोंख गयी वो रात की पायजेबों में.

वो घूँघट से झाँकती, मुस्काती आँचल के ओट से
वो लचक कमर की अब कहाँ इन मदिरालय की अप्सराओं में.

परमीत सिंह धुरंधर

प्राचीन प्रेम पनघट पे


मेरे ह्रदय की गति को बढ़ाकर
वो तरुणी अपनी संचित मुस्कान बिखेरकर
बोली, “हे पथिक, किस पथ के गामी हो?”
किस ग्राम के वासी हो?
हे प्यासे, थोड़ा अपनी प्यास बुझा लो
ये वन नहीं, यहाँ तुम्हे भय नहीं
सो मृग सा अपनी पलकों को थोड़ा झपका लो.

तुम्हारे गोरे मुख को
ग्रास रहा है सूर्य अपने तप से.
और थकान मदिरा घोल रहा है
तुम्हारे नस- नस में.
अविवाहित हो क्या?
जो इतना उतावलापन है.
गठरी को धरा पे रख
इस वटवृक्ष के तले थोड़ा सुस्ता लो.
कहो तो घर से रोटी – मीठा ला दूँ
हलक के साथ – साथ, उदर की
जठराग्नि को भी मिटा लो.

परमीत सिंह धुरंधर

चोली का बटन खुला – खुला।


ए मौसम देख ज़रा
क्यों मेरा रंग है खिला – खिला?
ऐसी चढ़ी जवानी मुझपे
रखती हूँ मैं चोली का बटन खुला – खुला।

कितने भौरें तड़प रहें?
कितने भौरें हैं तरस रहें?
ए मौसम देख ज़रा
मेरे वक्षों पे है बसंत नया – नया.

परमीत सिंह धुरंधर

कौवा और चोली का धागा


मेरा कौवा काला – काला
ढूंढे कोई मधुशाला
जहाँ मदिरा हाँ पिलाये
कोई कमसिन सी एक बाला।

दो नयना हो तीखे – तीखे
और वक्षों के मध्या
चमके कोई छोटा
सा तिल एक काला।

फिर पंख फैला के
उड़ जाए आसमा में
चोंच के मध्या दबा के
चोली का कोई धागा।