हे गणपति अब तो पधारो


हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?

हे गजानन, हे वक्रकुंड
अब तो रख दो मस्तक पे हाथ ही.
कुछ तो मिले सहारा प्रभु देवव्रता
कब तक भटकता रहूं?
मरुस्थल में यूँ असहाय ही.

एक आपका नाम जपकर हे गौरीसुता
सबका बेड़ा पार हुआ.
कब तक मैं पुकारूँ आपको हे गदाधर?
छूट रहा मेरा सांस भी.

आपका – मेरा अनोखा है रिश्ता, हे गजकर्ण
आप मेरे अग्रज, आप ही सखा
आप ही मेरे भाग्या भी.

अब तो निष्कंटक कर दो
पथ मेरा, हे गणाधाक्ष्य
बिन आपके इक्क्षा और आशीष के हे चतुर्भुज
रख नहीं सकता मैं एक पग भी.

हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?

परमीत सिंह धुरंधर

उस जल की तमन्ना है


जहाँ पल न मिले पल को
उस पल की तमनन्ना है.
जहाँ कल ना बिछुड़े कल को
उस कल की तमनन्ना है.

कुछ भी नहीं है, बस बिजुरी के सिवा
बिन बिजुरी के बादल मिले
बस इतनी तमन्ना है.
कण – कण में अतृप्त है मेरी आत्मा
इसके कण – कण को जो भिंगो दे
उस जल की तमन्ना है.

परमीत सिंह धुरंधर

बरसे भी तो जलती ही आग है


कण – कण में व्याप्त है
फिर भी अपर्याप्त है
लालसा है मन की
या लिखित बेचैन ही भाग्य है.
अंत नहीं भूख का
जहाँ मौत भी एक प्यास है.
आँखों के काजल सा
बिजुरी में बादल सा
बरसे भी तो हाँ, जलती ही आग है.
दिखता नहीं
निकलता नहीं
छुपता नहीं, फिर भी
रौशनी के मध्य
एक अदृश्य – अन्धकार है.

नयनों के खेल सा सा
दिलों के मेल सा
जो तोड़े न मन को
जो जोड़े ना तन को
जिससे मिलन को
हर पल उठती हाँ टिस है
मधुर मिलन पे फिर
लगती भी ठेस है.
ऐसी है वासना
फिर भी है छोटी
आगे उसके
ऐसा अनंत तक उसका विस्तार है.

बांधों तो वो बांधता नहीं है
साधो तो वो सधता नहीं है
कालचक्र से भी परे है वो
काल से भी वो मिटता नहीं है.
सृष्टि उसके बिना अपंग – अपूर्ण है
और उसके संग सृष्टि, नग्न – न्यून है.
है मिश्री के मिठास सा
अंगों पे श्रृंगार सा
नारी जिसके बिना सुखी एक डाल है.
और यौवन जिसके बिना हाँ बस एक लास है.

परमीत सिंह धुरंधर

माहिर


निकला था राजकुमार सा
अब मुसाफिर हो गया हूँ.
ए जिंदगी देख तेरे इस खेल में
एक मासूम मैं, कितना शातिर हो गया हूँ?

देखता था हर एक चेहरे में माँ और बहन ही
पर इनकी नियत और असलियत देख कर
मैं भी अब माहिर हो गया हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

दूसरा चिराग नहीं दिखता


यूँ तो दोस्त कई हैं इस शहर में
पर तुम सा दुश्मन दूसरा नहीं मिलता।

कौन कहता है की तुम अकेले रह गए हो इस जीवन में?
मुझे अंधेरों में जलता कोई दूसरा चिराग नहीं दिखता।

शौक किसे नहीं तेरी इन लबों का?
मगर इन लबों पे वफ़ा भी तो नहीं मिलता।

दर्द किसको दिखायें इस जमाने में अपना?
जीवन में दूसरा पिता नहीं मिलता।

तारीफों का शब्द


क्या किस्मत पाई है तुमने भी Crassa?
तुम सा शहर में कोई दूसरा नहीं मिलता।

कितना भी काम आ जाए हम किसी के
अब वो तारीफों का शब्द नहीं मिलता।

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न की एक मल्लिका


वो जब हुस्न की एक मल्लिका बनीं
तो समझी की वो एक खुदा बनीं।
और तुरंत उनका फैसला आ गया
की वो अब से किसी और की बनीं।

परमीत सिंह धुरंधर

बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं


बादल बरसने से इंकार कर रहे हैं
हवाओं का रुख भी बदलने लगा है
फूल, कलियाँ, भौरें, सब मुख मोड़ने लगे हैं.
ए दिल ये किस मोड़ पे आ गया हूँ ?
चाँद, तारे, सब राहें बदलने लगे हैं.
किस से कहें हाले-दिल अपना?
हर चेहरा मुझे देख के नकाब पहनने लगा है.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

जो सत्ता में हैं, वो मेरे अब साथी नहीं
जो विपक्ष में हैं, वो अब साथ आते नहीं।
वो जो अब तक मेरी हर परेशानी में
मेरे पास बैठे थे.
वो जो अब तक अपनी हर परेशानी में
मुझे अपने पास बुलाते थे.
मुझसे सम्मिलित हर समीकरण
वो अब बदलने लगे हैं.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

नजरों का बस एक फेर है जिंदगी
वो जो मेरे थे कल तक
अब मुझसे कतराने लगे हैं.
वो जो मुझसे पूछ कर सवरते थे
वो जो मेरे कहने पे रंग बदलते थे
इस कदर बदल गया है राहे -सफर उनका
की भीड़ को मेरे खिलाफ उकसाने लगे हैं.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

यही तो एक मंजर था


वो लाख चाहकर भी छिटक न सकीं मेरी बाहों से
लोक-लज्जा, शर्म-हया, सबके टूटने का
यही तो एक मंजर था.

बंद आँखों में कितने चिराग जल उठें?
उनके मशाल बनने का यही तो एक मंजर था.

पिघल रही थी बरसो से जमी वो बर्फ
अलग – अलग इन धाराओं के मिलकर बहने का
यही तो एक मंजर था.

गली – गली से निकले,
भांति – भांति, अलग जाती के लोग
सत्ता के खिलाफ मिलकर लड़ने का
यही तो एक मंजर था.

मंजिल


तन्हा रहा सफर ए मंजिल तेरी चाहत में
तू मिली भी तो एक तन्हाई है तेरे इस आँगन में.

परमीत सिंह धुरंधर