बहुत उदास हूँ समंदर तेरी चाहत में,
मैं प्यासा तो रह सकता हूँ तेरी इंतजार में,
मगर बर्दास्त नहीं की तेरी लहरें लौट जाए,
बिना आये मेरे आगोस में.
कब कहा की घूँघट उठा कर दीदार दे अपने हुस्न का?
कब माँगा की जिस्म को छूकर अहसास दे अपनी वफ़ा का?
मगर बरदास नहीं की तू ज्वार-भाटा बन जाए,
एक आसमा के चाँद के ख्वाब में.
परमीत सिंह धुरंधर