मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत कम होते हैं,
जिन्हें अपने शहर में,
मिलता है मौक़ा -इश्क़ का.
आपने वहां शिविर डाला है,
जो शहर ही है, मेरे इश्क़ का.
परमीत सिंह धुरंधर