दोस्तों ने बुला लिया


जिंदगी उदास थी
तो दोस्तों ने बुला लिया।
बोलें, “थोड़ा मुस्करा परमीत”
तो मैंने ठहाका लगा दिया।

मिले चारों यार मेरे
तो रात भर
वही किस्सों की पुरानी केतली
चूल्हे पे बिठा दिया।
वो बोलें, “थोड़ा कुछ निकाल परमीत”
तो मैंने ठहाका लगा दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

तुम कहो अब ए सुंदरी


गहन – गहन अध्ययन करके भी
तुम्हारे सौंदर्य से मैं हार गया.
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे अधरों से पान करूँ?

वेद – पुराण पढ़ कर भी
मैं हृदय अपना ना साध पाया।
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे यौवन का रसपान करूँ?

परमीत सिंह धुरंधर

महराणा से Crassa तक


वीर कई धरती पे हुए
पर महराणा सा न कोई वीर हुआ.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।

कोई नहीं था जो
टिक जाता खडग के आगे.
महाराणा ने जिस खडग को
अपने बाजुओं का बल दिया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।

ना नरम बिछोना
ना मदिरा का पान किया।
कतरे – कतरे से लहू के अपने
हमने माँ का श्रृंगार किया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।

महराणा से Crassa तक
सबने है इतिहास रचा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने प्रेम में सबका मान रखा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।

परमीत सिंह धुरंधर

यौवन


इंसान तेरे क़दमों की बस यही एक कहानी
रुक जाएँ तो, कौन साथ इनका मांगता?

धुप में जो रूप खिले, ऐसा यौवन है वो
शीत के चाँद को कौन आँगन से है देखता?

परमीत सिंह धुरंधर

श्री हरी विष्णु


तुम करुणामयी भक्तवत्सल
तुम धर्म का आधार हो.
सर्वव्यापी, निरंतर, अचर-अगोचर तुम
तुम सनातन साकार हो.
मैं मुर्ख -अज्ञानी – पापी
मुझे क्षमा करो, मेरा उधार हो.
सृष्टि के आदिकर्ता, पालक – संहारक तुम
तुम ब्रह्म निराकार हो.
जीव – अजीव सब तुममे समाहित
तुम कण – कण में विराजमान हो.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ – II


न व्यर्थ करो मेरे जीवन को
अपने गर्व के आवेश में
तुम दम्भ से ग्रसित गजराज हो
मैं शर्म से संकुचित तरुणी हूँ.

तुम यश – गाथा के लालसी
मैं अंक की तुम्हारे अभिलाषी हूँ.
ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ


ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.

अपना बना लो मुझे
आतुर मैं प्रचंड अग्नि हूँ.

व्यर्थ न करो मेरे तन – मन को
मैं तुम्हारी जीवन – संगिनी हूँ.

क्या प्राप्त कर लो गे, गंगा-पुत्र?
इस प्रतिज्ञा को पाल कर.
भीष्म तो बन जाओगे
पर मैं तुम्हारी अधूरी – जिंदगी हूँ.

मेरी साँसों में प्रवाहित हो तुम
मैं ही तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबों की सुन ले ए दाता-II


गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

बड़े भोले है ये, बड़े निश्छल है ये
पल में छल जाते हैं, पल में बिक जाते हैं
पल में प्रेम में बंध के यहाँ।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
तू छलता रहे, तू ठगता रहे, शिकवा नहीं तुझसे
इस छलावे में ही तो है जीवन की सारी माया।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

तू भी जी के गया, बनके मानव यहाँ
तुझको है पता, जीवन की हर एक पीड़ा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
किसको पुकारूँ, किससे माँगूँ सहारा?
पग को मेरे जल में, ग्रह ने है बांधा
छोड़ो निंद्रा बैंकुठ के स्वामी
ललाट तक भक्त है अब डूबा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

बेबस, लाचार,
अपने शर्म से ही खुद मर जाते हैं.
कोई दुआ नहीं, कोई दया नहीं,
जीवन में इनके,
बस तेरी एक आस के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू है विधाता।
क्या माँगूँ तुझसे और तेरे दर पे?
मेरे आंसुओं है तेरा साया।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर

तू पगली कैसी पागल है?


तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
पहन के चूड़ी, और नई साड़ी
गली – गली इठलाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
बिना बालम के अंक के ही
नित पुष्प सी खिल जाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
एक चिठ्ठी पाकर ही उनकी
जो तितली सी उड़ जाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
देख के उनको दुआर पे अपने
दर्द-गरीबी, सब भूल जाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
स्वर्ण-चांदी, आभूषण-रहित अंगों को
अपने आँचल में छुपाती है.

परमीत सिंह धुरंधर

आनंद


जो पतित है, वही पावन भी है.
जो मलिन है वही पारस भी है.

जलता है दिया जमाने के लिए
पर उसके लिए बस अन्धकार ही है.

क्या माँगूँ खुदा तेरे दर पे यहाँ?
जब आंसुओं में मेरे तेरा साया भी है.

तू जी कर गया, बनके मानव यहाँ
पता है तुझे, इस पीड़ा में ही प्यार भी है.

तू ठगता रहे, तू छलता रहे, शिकवा नहीं तुझसे
इस छलावे में ही मिलता आनंद भी है.

एक ही खुदा सबका, एक ही पीड़ा सबकी
इसी पीड़ा ने तुझसे सबको बांधा भी है

परमीत सिंह धुरंधर