विष भी पि लूंगा


यूँ ही नहीं तेरे लिए अपना खून बहाऊंगा,
तू कभी मिल तो सही तुझे अपना लहू पिलाऊंगा।
तेरी मंशा अगर मुझे मिटाने की ही है साकी,
तो अपने अधरों पे रख के दे, विष भी पि लूंगा।

शिव का भक्त हूँ,
मेरा प्रेम कोई चंचल नहीं है.
तुझे अगर चाहत है आभूषणों और दौलत की,
तो मैं वो गृहस्थ नहीं बन पाउँगा।

मेरी आदत है अकेला ही चलने की,
भीड़ को मैं अपने साथ नहीं रखता।
तुम्हे अगर चाहत है सत्ता की,
तो मेरा साथ छोड़ दो,
मैं अपने बगावत के रंग नहीं बदल पाउँगा।

Dedicated to Baba Nagarjuna

परमीत सिंह धुरंधर

बर्दास्त नहीं


बहुत उदास हूँ समंदर तेरी चाहत में,
मैं प्यासा तो रह सकता हूँ तेरी इंतजार में,
मगर बर्दास्त नहीं की तेरी लहरें लौट जाए,
बिना आये मेरे आगोस में.

कब कहा की घूँघट उठा कर दीदार दे अपने हुस्न का?
कब माँगा की जिस्म को छूकर अहसास दे अपनी वफ़ा का?
मगर बरदास नहीं की तू ज्वार-भाटा बन जाए,
एक आसमा के चाँद के ख्वाब में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सौतन खटिया


जब से जवनिया के चोलिया में बंध नी,
नगरिया के सब कोई पूछे ला उमरिया,
कैसे कहीं ए सखी, शर्म के छोड़ के?
सौतन भइल बिया जाड़ा में खटिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मूछों पे ताव


वो अपनी ही जवानी में मगरूर
रात भर मूछों पे ताव देता रहा,
सखी मैं तो चुचाप रही ये सोचकर
की कहीं वक्षों में दांतों का ना दाग देख ले.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पिता बन कर


हर जनम में पिता बन कर
हे प्रभु शिव
रखों मेरे सर पे अपना हाथ.
और मैं पुत्र बनकर
आपके चरणों को धो के पीता रहूँ
जपता रहूँ आपका नाम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कुटिल चाल


वक्ष विशाल
उसपे दो नयन
चलें कुटिल चाल.

उनसे भी जो बच जाए रानी
उनको तेरी कमर दे गहरा घाव.

बलखाते तेरे नितम्बों पे
नागिन सी लहराय
तेरी काली – काली चोटी
कितनो की जवानी जलाय।

उससे भी जो बच जाए रानी,
उसे लूट ले तेरा ये श्रृंगार।

 

परमीत सिंह धुरंधर

ए चाँद


ए चाँद तेरी आँखों का बहाना चाहिए,
क़त्ल ही कर दे मेरा,
मुझे मंजूर है,
पर तेरी साँसों का सहारा चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं मेरे किस्से ना वो पूछ ले


अंग – से – अंग लगा के,
रात बोल गए सैया,
बड़ा रस भरा है मुझमे।
सखी मैं तो चुपचाप रही,
की कहीं दिया जला के ना देख ले.

करवट भी ना बदल पायी रातभर,
ऐसे जकड़ा था बाहों में.
सखी मैं तो चुपचाप रही,
की कहीं साड़ी हटा के ना देख ले.

ऐसा अनाड़ी सैया,
अपने ही किस्से सुनाते रहा रातभर।
सखी मैं तो चुपचाप रही,
की कहीं मेरे किस्से ना वो पूछ ले.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ


डूबता हैं किनारें वही,
जो नदियों के सहारे हैं.
है समुन्दर यहाँ अपना,
और हम समुन्दर के किनारें हैं.

चुभते हैं काँटे उनको,
जिन्हे फूलों की तमन्ना।
है शीशम यहाँ अपना,
और हम उसकी शाखाएँ हैं.

गर्व किसी का भी हो टूटता है,
खुदा से कितना भी दुआ कर लो.
हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ,
और हम उनके तराने हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शब् बस गुजारिश में गुजरा


रातों का सफर यूँ तन्हाई में गुजरा,
तुम याद बहुत आये शब् बस गुजारिश में गुजरा।
पलके भी इंतज़ार में इस कदर बिछ गए,
ना तुम आये ना तुम्हारे ख़्वाबों का कारवाँ गुजरा।

जिंदगी को बेबसी का एक एहसास करा गए,
बिना मिले ही खो देने का उपहास करा गए.
सितम कुछ ऐसा की हर पल,
तुम्हे ना पाने के खौफ में गुजरा।

 

परमीत सिंह धुरंधर