इतना भी ना बदल ए वक्त
की मैं ही बदल जाऊं।
तेरे शहर को छोड़ने से पहले ही बिखर जाऊं।
परमीत सिंह धुरंधर
इतना भी ना बदल ए वक्त
की मैं ही बदल जाऊं।
तेरे शहर को छोड़ने से पहले ही बिखर जाऊं।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं तो मुंबई से पहले ही परास्त हुआ
तुम तो मुंबई तक पहुँच गए.
मैं अपने पहली ही जंग में हार गया
तुम तो कितने जंग फतह कर गए.
यह लड़ाई न मेरी है, ना यह जंग तुम्हारी थी
ये जंग हमारी है, हाँ ये जंग हम सबकी है.
यह जंग है,
हमारे सपनों की उनके गुनाहों से
हमारे अधिकारों की उनकी सत्ता से
हम छोटे शहर की चींटियों की
इन जंगल के हांथियों से.
चाणक्य की
धनानंद के उन्माद और अहंकार से.
आज भले हम हार गए
आज भले दूर -दूर तक
हमारे सितारे धूमिल हैं.
मगर हम शिवाजी के छोटे झुण्ड में आते रहेंगें
और लुटते रहेंगे इनके महलों को
इनकी खुशियों को, तब तक
जब तक औरंगजेब की इस सत्ता
को नष्ट ना कर दे,
तबाह ना कर दे.
हम चीटिंयां हैं चाणक्या के
हम चिड़ियाँ हैं गुरु गोबिंद सिंह जी के
हम कटेंगे, हम गिरेंगे, पर लड़ेंगें तब तक
जब तक विजय श्री हमारी नहीं।
आज चाहे जितना उत्सव माना लो मेरे अंत का
कल तुम्हारा जयदर्थ सा अंत करेंगे।
परमीत सिंह धुरंधर
बेलगाम, बेधड़क, बेदाग़, बेबाक हूँ
हर खेल का माहिर धुरंधर
छपरा का मस्तान हूँ
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.
रंगों से बना नहीं
मगर हर एक रंग में शामिल हूँ
कुवारियों के आँखों का ख्वाब
विवाहितों के दिल की कसक
मैं अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ।
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.
नागार्जुन का विद्रोह
दिनकर की आवाज हूँ
बुद्ध, महावीर का तप – त्याग
गुरु गोविन्द सिंह जी और चाणक्य
का शंखनाद हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.
पनघट पे गोरी की मुस्कान
मस्ती में बहता किसान हूँ
पुरबिया तान, खेत -खलिहान
फगुआ में भाभियों की सताता
निर्लज -बदमाश हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं बुलंद हूँ, और बुलंदी मेरी आपके नाम से मेरे प्रभु
मैं भक्त हूँ, और मेरी भक्ति आपके चरणों से मेरे प्रभु।
स्वयं शिव भी लगावे ध्यान जिसका
रुद्रावतार लेकर करे बखान जिसका
टूट जाए माया की हर जंजीर, एक तेरे नाम पे प्रभु
भवसागर में सहारा बस एक तेरा ही, मेरे श्रीराम प्रभु।
Dedicate to the Shri Ram Mandir construction.
परमीत सिंह धुरंधर
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
तू थाम रही है जाने अब किसकी हाँ बाहें
ना वो शर्म ही रही, ना वो घूँघट ही रहा.
तूने ही हमको मयखाने से लेकर
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ाई थी कभी
अब ना वो देवी ही रहीं, ना साकी ही रहा.
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
मासूम नयन तेरे और भोले चेहरे से
ना जाने किन-किन को यहाँ धोखा ही मिला?
क्या वफ़ा करे मोहब्बत में कोई ?
जिसकी किस्मत में तू महबूब है मिला।
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
परमीत सिंह धुरंधर
आम -कटहल
गेहूँ -धान
जामुन -लीची
इन नामों को किसान जीवन देता है.
ख़्वाबों को हकीकत
और जिव्हा को स्वाद देता है.
परमार्थ क्या, स्वार्थ क्या?
अरे राजा के यज्ञ
और ब्राह्मणों के हवन -कुंड में
देवताओं के आव्हान को
सफल करने को घी और अन्न देता है.
धरा को सुंदरता -सौम्यता
पक्षी – कीट, मूषक को
परिश्रम का मौक़ा
गाय – बैल को देवी -देवता
और पत्नी को गृहलक्ष्मी बनने
का सुनहरा अवसर देता है.
पुत्र को आलस
पुत्री को अच्छे वर का ख्वाब
चिलचिलाती धुप और कड़कड़ाती ठंढ में
उषा के आगमन पे
बिना विचलित हुए
किसान हाथों में अपने
हल थाम लेता है.
इंसान इसी रूप में
मुझे नारायण, भोलेनाथ
और भगवान् लगता है.
परमीत सिंह धुरंधर
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
मानव तू साधारण सा
ठान ले तो दानव सा
अंत ना हो जिसका
उस दम्भ का बिस्तार कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
माया – मोह निकट नहीं
मन – मष्तिक विकट नहीं
काल के कपाल पर
तू अपना नाम गढ़.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
निर्मल पवन सा
निर्भीक गगन सा
पावन गंगा सा
हर दिशा में प्रवाह कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
काँटों और फूल से
कृपाण और शूल से
तन का सम्बन्ध जोड़
मन को ना अधीर कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
पत्नी ना पुरस्कार
अपमान ना तिरस्कार
खोने को अपना सब कुछ
हर क्षण खुद को तत्पर कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा इश्क़, कोई हवस नहीं है
अतः यह किसी भीड़ की मोहताज नहीं है
हुस्न और मेरी राहें हैं अलग -अलग, पर
मेरा मकसद घूँघट उठाना है, कोई चीरहरण नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
पिता और मैं, जैसे
सुबह की लालिमा
और चाँद की शीतलता
दोनों एक साथ
जिसका स्वागत करते
पक्षीगण कलरव गान से.
पिता और मैं
सुसुप्त अवस्था में
जैसे कोई ज्वालामुखी
और बहुत अंदर उसके सीने में
कहीं आग सा धड़कता मैं.
पिता और मैं, जैसे
छपरा का कोई धुरंधर
त्यागकर अपनी चतुराई
और चतुरंगी सेना
बना मेरा सारथि
और कुरुक्षेत्र में उतरता
नायक बन कर मैं.
पिता और मैं, जैसे
शिव और भुजंग
पिता और मैं, जैसे
हरी और सुदर्शन
पिता और मैं, जैसे
सूर्य और अम्बर
पिता और मैं, जैसे
श्री गणेश और मूषक।
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम हो तो पिता सा
गोर मुख पे काले तिल सा.
हम सोंचे ये रूप है मेरा
ये यौवन है मेरा
मगर जमाना जानता है
की ये कमाल है इस तिल का.
हवाओं ने रुख बदले
सितारों ने चाल बदले
यौवन के ज्वार में रिश्ते
और रिश्तेदार बदले
मगर वो अटल है अम्बर पे ध्रुव सा.
परमीत सिंह धुरंधर