तन्हा रह गया सवरने में
और उम्र गुजरी तो दर्पण भी टूट गया.
जिंदगी का फलसफा बस यूँ ही रहा
की जिसे गले लगया, वो ही खंजर उतार गया.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हा रह गया सवरने में
और उम्र गुजरी तो दर्पण भी टूट गया.
जिंदगी का फलसफा बस यूँ ही रहा
की जिसे गले लगया, वो ही खंजर उतार गया.
परमीत सिंह धुरंधर
कौन है जो किताबों में तस्वीर नहीं रखता?
ये बस Crassa है जो किताब ही नहीं रखता।
वो उम्र भर की मोहब्बत जो ना मिल सकी
उन्हें भी पता है की मैं कोई और चाहत नहीं रखता।
बहुत खौफ में है ये शहर
की हर कोई अनजान है लगता.
दिल इस कदर डूबा हूँ दर्द में
की दूर – दूर तक कुछ और नहीं दिखता।
परमीत सिंह धुरंधर
वो दुल्हन सी लगी
जो दौलत से सजी.
उसके पाप, पुण्य से लगे
उसकी वासना
नारी – अधिकार लगी.
उसका कहा हर एक शब्द
वेद के शब्द लगे.
और मैं नारी का सम्म्मान करने लगा
उसके आगे नतमस्तक हो
उसके पीछे – पीछे
पथ गमन करने लगा.
वो चरित्रहीन, कुलटा सी लगी
जब उसकी गरीबी में
फटी साड़ी में
उसकी जवानी चढ़ने लगी.
उसका आँखों में काजल लगाना
दुप्पटा संभालना
बच्चो को चूमना
सब हम पुरुषों को आकर्षित करने की
लालसा सी लगी.
और मैं पुरुष के दम्भ में
जबरदस्ती उसे पाने और उसकी लालसा मिटाने को
उसके पीछे – पीछे
पथ गमन करने लगा.
ए दोस्त
दुश्मनों को बता दो
शहर में कोई नया आ गया है.
ये रंगत, ये लज्जत
ये नजाकत
अरे, पूरा – का – पूरा
एक जन्नत आ गया है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम हो
तो
ये शहर है.
वरना इन मकानों में क्या रखा है?
ये फूल, ये कलियाँ
तुम हो
तो
ये उपवन है.
वरना इन बहारों में क्या रखा है?
ये चाँद, ये सूरज
तुम हो
तो
ये जीवन है.
वरना इन साँसों में क्या रखा है?
परमीत सिंह धुरंधर
आँखों – से – आँखों
में आवो आज फैसला कर लें.
मैं चुमू तेरे लबों को ऐसे
जैसे भगवान् शिव ने उठाया था
प्याला गरल का.
आँखों – से – आँखों
में आवो आज फैसला कर लें.
मैं थाम लूँ तुम्हारी कमर ऐसे
जैसे श्री राम ने चढ़ाई थी
शिव-धनुष पे प्रत्यंचा।
आँखों – से – आँखों
में आवो आज फैसला कर लें.
मैं बांध जाऊं
तुम्हारी जुल्फों में ऐसे.
जैसे देवव्रत ने की थी
भीषण, भीष्म – प्रतिज्ञा।
परमीत सिंह धुरंधर
वो जो कल तक मुझसे पूछते थे
की मयखाना किधर है?
आज जमाने को बता रहें हैं की
मयखाना किधर है?
वो जिनको शिकायतें थीं कल तक
की हम उन्हें देखते नहीं हैं.
की हमें शिकायत है की अब
उन्हें देखते नहीं हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ ऐसे भी न कर
की पथरा जाएँ माँ की आँखें।
ऐसे भी खामोस कर दिया है
शहर को उसने।
परमीत सिंह धुरंधर
ईसामसीह जी कह गए रामचंद्र जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
तन्हा – तन्हा सा Crassa
तन्हाई में गायेगा।
रामचंद्र जी कह गए ईसामसीह जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
अकेला ही Crassa
वन में फूल खिलायेगा।
ईसामसीह जी कह गए रामचंद्र जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
हिन्दू – मुस्लिम, सिख – ईसाई
हर लड़की से Crassa चोट खायेगा।
रामचंद्र जी कह गए ईसामसीह जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
हर ब्रह्मास्त्रा को Crassa
अकेला ही काट गिरायेगा।
परमीत सिंह धुरंधर
मोहब्बत
एक दास्ताँ बन जाए.
कुछ ऐसे करो
की कोई निशाँ बन जाए.
आज हम हैं तुम्हारी बाहों में
कल हों या ना हों.
इस कदर चुम लो इस एक रात में
की जिंदगी आसान हो जाए.
परमीत सिंह धुरंधर