मेरे बाहर कुछ भी नहीं


मैंने प्यार में क्या – क्या गवाया?
इसकी कोई गिनती नहीं।
सब मेरे अंदर है,
मेरे बाहर कुछ भी नहीं।

समेट लूँ, समेट लूँ, समेट लूँ
दुनिया की हर ख़ुशी
हर कोई यही चाहता है आज.
मेरी ख़ुशी क्या है?
मैंने आज तक समझा ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती


हर किसी की मोहब्बत में ख्वाइशें नहीं होती
बिस्तर तो होती है पर सिलवटे नहीं होती।

क्या संभाले कोई जिंदगी को ?
सँभालने से जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती।

शिकायतें बढ़ती जा रही हैं उसकी
हर रात जिंदगी के साथ.

अब चाँद कहने और चुम्बनों से
दूर उनकी शिकायतें नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

चिठ्ठी मेरी


कातिल बड़ी है नजर ये तेरी
प्यासे हैं सब देख जवानी तेरी।
कभी किताबों में कुछ तो हाँ लिख दे
अगर पढ़ नहीं सकती चिठ्ठी मेरी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेआबरू


जो हमें हमारी आरजू दे गए
कसम से बड़े बेआबरू कर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खुदा कहाँ है?


सब चाहते हैं जानना की खुदा कहाँ है?
जन्नत कहाँ है?
माँ जिधर कदम रख दे
उससे हसीन भला और क्या है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

पतली कमर का सिहरना हुआ


उनसे नजर का जो मिलना हुआ
पतली कमर का सिहरना हुआ.
कैसे सँभालते साँसों को हम?
नस-नस में उनका ऐसे उतरना हुआ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उम्र की बंदिशे


इश्क़ ने तन्हा कर दिया उम्र की बंदिशे लगाकर
उनकी पावों में पायजेब दे दिया मेरी नींदे उड़ाकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नर्मदा


सर्वदा – सर्वदा
बहती रहो धरा पे
नर्मदा – नर्मदा।

सम्पूर्ण करती हो भारत को
यूँ ही सम्पन करती रहो भारत को
गंगा – जमुना,
ताप्ती – गोदावरी – नर्मदा।

तुम्हारे ही तट पे रचे गए
वेद-उपनिषद-पुराण
तुम्हारे ही धाराओं से
उत्पन हुए ऋषि – मुनि – विद्वान।

सदियों से कर रही हो
भारत को परिभाषित
यूँ ही बनी रहो भारत की परिभाषा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।

युगो – युगो से
पाल रही, पोस रही
सृष्टि को इस धरती पे
युगो – युगो तक यूँ ही माँ
करती रहो सबपे कृपा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे नयन, नख से तीखे


ऐसा भी नहीं की मैं सजती रहूं दिन भर
ए आइना अपनी औकात में रह.
ऐसा भी नहीं की मैं सजना छोड़ दूँ
ए आइना अपनी औकात में आ.

अभी तो अंग खिलें हैं मेरे
अभी तो पंख खुलें हैं मेरे
ऐसा भी नहीं की उड़ना छोड़ दूँ
ए हवा अपनी औकात में आ.

ये घोंसले उन खगों के हैं
जिनमे अब उन्माद नहीं।
मेरे नयन, नख से तीखे
तो ए निशा अपनी औकात में आ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जो रणभूमि में अपनों पे गांडीव उठाने लगे


हसरते उन्ही की दिलों में रखिये
जिनकी यादों में हैं पीने लगे.
कब तक संभालोगे जाम हाथों से
आँखों से दर्द जब हैं छलकाने लगे.
अधूरा है जीवन सब का यहाँ
चाहे राम हो या गुरु गोबिंद सिंह जी.
राजपूत वो ही है सच्चा
जो रणभूमि में अपनों पे गांडीव उठाने लगे.

 

परमीत सिंह धुरंधर