स्त्री का शोषण


गुनाहों का भी चरित्र होता है,
तभी तो,
स्त्री का शोषण करने वाले,
ही उसके दिल के करीब हैं.

कब समझा है मेनका ने?
प्रेम, मातृत्वा, और वातशल्या को,
तभी तो चाँदी और सोने के बदले,
उसके अंग – अंग पे भोगी – विलासी,
का अधिकार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैंने तो बस माँ को नमन किया है


गहन अध्धयन कर के,
मैंने सर झुका दिया है.
और गलत समझ रहे हैं आप लोग,
मैंने तो बस माँ को नमन किया है.

यौवन जिसका खो गया,
चूल्हों से दिन – रात जूझते।
सौंदर्या जिसका कुम्हला गया,
पकवानों से मेरे जढराग्नि को तृप्त करते।

उस दुर्लभ प्रेम को मैंने,
मैंने दुर्जन में समझ लिया है.
सुशीला देवी का सुपुत्र हूँ,
नस – नस ने मेरे इस ज्ञान पे,
अभिमान का आभास किया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों की गोलाईयाँ


कहाँ – कहाँ से लाती हो?
अंगों पे अपने बिजलियाँ।
चंचल – चपल नयन तुम्हारे,
उसमे मयखाने की मस्तियाँ।

सुराही सी पतली कमर पे,
यौवन की अटखेलियाँ।
सुन्दर – सुसज्जित-सुगन्धित उपवन की,
फीकी पद गयीं हैं सारी कलियाँ।

कोमल – कोमल अधरों का,
पल – पल में कम्पित होना।
जैसे उषा के आँगन में,
पुष्पित होती पंखुड़ियाँ।

सागर – अम्बर सब तड़प उठते हैं,
तेरे मुखड़े पे जब घुघंट आ जाए.
लहरें भी विचलित हो उठीं हैं,
देख के तेरे वक्षों की गोलाईयाँ।

कौन हरेगा, कौन बेधेगा?
तेरे रूप – यौवन के इस तिलिश्म को.
जो भी हो, अभी से ही,
टूटने लगी हैं आँगन – आँगन में चारपाइयाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिर बिहार देखिये


शहर देखिये, सुलतान देखिये,
अगर इतिहास देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

शर्म देखिये, सौंदर्य देखिये,
अगर यौवन देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

बलवान देखिये, पहलवान देखिये,
अगर पौरष देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

कलियाँ देखिये, कांटे देखिये,
अगर फूल देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

मुंबई देखिये, दिल्ली देखिये,
अगर किसान देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

काश्मीर देखिये, कन्याकुमारी देखिये,
अगर भारत देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

गीता पढ़िए, कुरान पढ़िए,
अगर इंसानियत पढ़नी है तो,
फिर बिहार देखिये।

नेहरू पढ़िए, गांधी पढ़िए,
देश को जानना है तो,
फिर राजेंद्र बाबू पढ़िए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो ही कृष्णा है


जो मधु से मधुकर,
जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतर,
जो भय से भी भयंकर,
वो ही कृष्णा है.

जो प्रबल में प्रबलतम,
जो न्यून में न्यूनतम,
जो श्रेष्ठ में श्रेष्ठतम,
वो ही कृष्णा है.

जो सागर में समुन्दर,
जो चिर में निरंतर,
जो अमृत के सामानांतर,
वो ही कृष्णा है.

जो कण – कण में सम्माहित,
काल में प्रवाहित,
काम-तप-रज में संचालित,
वो ही कृष्णा है.

जो भूखंड के खंड में,
पुष्प के मकरंद में,
जो आनंद – विरह के क्षण में,
वो ही कृष्णा है.

जो नारी के सौंदर्य में,
शिशु के बालपन में,
और प्रेयसी के आलिंगन में,
वो ही कृष्णा है.

जो रण में,
शयन में,
मन के हर चुभन में,
वो ही कृष्णा है.

जो शिव के तांडव में,
इंद्रा के विलास में,
सरस्वती के ज्ञान में,
वो ही कृष्णा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी ही खंजर बन के


तुम मेरी धड़कनों में बस गए हो,
मेरी जान बनके।
कभी मेरी जान भी बन जावों,
मेरे जिस्म में उतर के.

इन आँखों को चुभते हो तुम,
जब गैरों के गले लगते हो.
मेरा भी क़त्ल कर दो तुम,
मेरी ही खंजर बन के.

तुम्हे महफ़िल का शौक है तो,
मुझे शमा बना लो अपनी महफ़िल का.
एक रात ही सही, उतर आवो मेरी पहलु में,
परवाना बन के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चोट


धरा पे चोट पड़े,
तो हरियाली छाती है.
सागर जो बाँध तोड़े,
तो बर्बादी छाती है.

कलियाँ विकसित हो तो,
काँटों का भय मिटा जाती हैं.
काले बादलों की बूंदें,
तन – मन का मैल मिटा जाती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चतुर चिड़ियाँ


सारा शहर जान गया है,
दर्द मेरे मन का.
कितनी चिड़ियाँ चुग गयीं हैं,
दाना मेरे आँगन का.
मैं हूँ भोला, मैं हूँ सीधा,
चिड़ियाँ बहुत चतुर हैं.
फुदक – फुदक के लूट रहीं हैं,
एक – एक कोना मेरा उपवन का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो कृष्णा हैं


जो रिश्ते में बंध के भी ना बंधे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो प्रेम में बंध के भी ना बंधे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो रणभूमि में स्थिर हो कर भी युद्ध करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो भीष्म के संगती में भी,
विदुर का साग खाये,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो त्रिलोकी हो के भी,
सुदामा को ताज दे दे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो भक्तों का क्रोध – ताप,
हंस के सह ले,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो राधा के मन में हो,
और रुक्मिणी संग चरे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो अलौकिक – अद्भुत होके भी,
कण – कण में विराजे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो सबको मोहित कर,
स्वयं निर्मोही रहे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो सबको साध्य कर,
स्वयं असाध्य रहे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो काल को संचालित कर,
स्वयं कालचक्र से ग्रसित हो,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो पांडवों संग रह कर भी,
कौरवों के संग प्रतिपल में विराज करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो अपने – पराये का भेद छोड़ कर,
सुदर्शन को संचालित करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ एक शब्द नहीं,
संसार है.
माँ सिर्फ धन नहीं,
कल्पवृक्ष, धेनुगाय है.
माँ सागर सी गहरी नहीं,
बल्कि अनंत हैं.
माँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं,
गंगा, सरस्वती भी है.
माँ सिर्फ साकार एक तन नहीं,
निराकार सम्पूर्ण ब्रह्म है.

 

परमीत सिंह धुरंधर