मंगलसूत्र अब पहनाना छोड़ो दोस्तों


अपनी – अपनी जिंदगी को जियों दोस्तों,
दूसरों के लिए लड़ना छोड़ो दोस्तों।

ये काम हैं फेमिनिस्टों – कम्युनिस्टों का,
कभीं उनको ये करने से ना रोको दोस्तों।

अगर हौसला है तो सामाज के लिए खुद को बदलो,
दूसरों को जयचंद कहना छोड़ो दोस्तों।

रोने का काम है नारी और केजरीवाल का,
कभीं उनको ये करने से ना रोको दोस्तों।

हौसला है तो सीमा पे लड़ों,
गलियों में मुठभेड़ अब छोड़ो दोस्तों।

काली – काली रातों को काली घटाओं का पता,
किसको है खबर और अंदेशा किसको दोस्तों।

हौसला हैं तो खुद मशाल बनो।
बिजलियों से रौशनी के लिए हाथ जोड़ना छोड़ो दोस्तों।

माँ का दूध पीया है तो सेवा भी करों,
बीबी के आँचल में सोना छोड़ो दोस्तों।

बिहारी हो तो गर्व से कहना सिखों,
ये फेसबुक – व्हाट्सप पे लिखना अब छोड़ो दोस्तों।

सारे ही रिश्ते हैं यहाँ फरेब के,
मंगलसूत्र अब पहनाना छोड़ो दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी


वो शाम की अंगराई, वो रातों की रजाई,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तेरी पतली कमर, जैसे मिटटी की ठंढी सुराही,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Bra और हल्दी


तेरे – मेरे आँखों का एक ही किस्सा,
भाने लगी तू मुझको बिन Bra हाँ.
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे खोलना पड़े मुझे सारी रात Bra।

तेरे – मेरे दांतों का एक ही है किस्सा,
दोनों को लग गया है खून का चस्का।
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे बहाना पड़े मुझे सारी रात पसीना।

तेरे – मेरे नैनों का एक ही है किस्सा,
दोनों हैं नशीले और दोनों हैं जवाँ।
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे सारी रात पड़े मुझे हल्दी छापना।

तेरे – मेरे रातों का एक ही है किस्सा,
तेरे बक्षों को डंसता बन के कोबरा।
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे सारी उम्र पड़े ये बोझ उठाना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्वरित – तरंगों से भगीरथ सा विचलित रहता हूँ


तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

तेरे सुर से इन साँसों में,
मैं मदिरा का अनुभव करता हूँ.
तेरी कमर की इस लचकता पे,
मैं भ्रमर सा गुंजन करता हूँ.

कभी आ जा भी तू,
साक्षात मेरे उपवन में,
नित रात्रि में स्वपन में,
तेरा अभिनन्दन करता हूँ.
पुष्प सी पुलकित हो,
मृग सी बिचरती है धरा पे,
तेरे यौवन के त्वरित – तरंगों से,
मैं भगीरथ सा विचलित रहता हूँ.

धनुष की प्रतयंचा सी,
तू कसी- कसी सी,
मैं राम सा तुझे कसने को,
हर पल में प्रबल रहता हूँ.
घनघोर घटा सी जुल्फे तेरी,
चन्द्रमुख को ढक लेती है जब,
चकोर सा व्याकुल -विचलित,
मैं तेरी आभा को तड़पता हूँ.

तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कलम के खिलाफ लड़कियाँ


यूँ ही मेरे कलम के खिलाफ नहीं हैं लड़कियाँ,
जमाने के लिए सच्ची, पर मुझसे बईमान हैं लड़कियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शकुंतला को जन्मते नहीं देखा


कौन कहता है की मैंने?
मेनका को नहीं देखा।
बस गर्भ से निकल कर,
धरती पे शकुंतला को रोते नहीं देखा।

पेट भरने को उसका,
खगचर भी तैयार हैं लाखों।
पर इतनी मेनकाओं के होते,
एक शकुंतला को जन्मते,
किसी ने नहीं देखा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं


सुबह हुई, फिर शाम हुई,
फिर रात तक वो परेशान हो गयीं.
एक बटन भी न खोल सका,
मैं चोली का उनके।
फिर अगली सुबह वो अपने,
कपडे -लत्ते समेटकर,
फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं।

सजाया – सवारा कमरे को अपने,
फिर इत्र से बिस्तर भी महकाया।
Shakespeare की नयी किताब ले कर,
जैसे ही रोमियो – जूलिएट के किस्से,
सुनाने बैठा,
वो अपने अंगों का भार लिए,
मेरे सीने पे सवार हो गयीं।
और फिर अगली सुबह,
अपने कपडे-लत्ते समेट कर,
फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ


तेरी काली – काली आँखों में हम काजल बनकर बह जाएँ,
तेरे गोरे – गोरे गालों पे कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ.
इस देश – सीमा के विवादों से दूर, तुझे लेके कहीं बस जाएँ,
मेरे नन्हें – मुन्नें चार, मेरा नाम लेकर, हर सुबह तुझसे लिपट जाएँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू उड़ती है कैसे?


ए चिड़िया,
तू उड़ती है कैसे?
नन्हें परों पे हौसला लेकर।

सुबह – सुबह निकल आती है,
सबसे पहले अपने घोसलें से.
जाने क्या ढूंढती है?
तुझे क्या मिलता है?
यूँ चहक – चहक कर,
गुंजन करने में.

ए चिड़िया,
तू फुदकती है कैसे?
बाज के शहर में,
यूँ निडर होकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर