बच्चों को सेरेलेक्स और फॉरेक्स से राहत है


ऐसा नहीं है की,
मेनका एक अपवाद है.
आज भी,
भारतीय नारी को बच्चे से ज्यादा,
विश्व – सुंदरी का ख़िताब,
और अच्छे फिगर की चाहत है.
और उनके बच्चों को,
सेरेलेक्स और फॉरेक्स से राहत है.

कौन कहता है की?
भारत की धरती पे,
नारियाँ अपने बच्चों को,
मोहब्बत, ममता और मातृत्व से पोषित करती हैं.
बच्चे बिलखते हैं,
और नारियाँ अपने जिस्म में दूध को संचित करती हैं.

कैसे कोई नारी सिखलाएगी?
अपनी संतान को नारी का सम्म्मान करना।
जब नारी को खुद रिश्तों से ज्यादा जिस्म,
और दौलत की चाहत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कौन कहता है?


जब स्वर्ण, आभूषण, और स्वर्ग हो सामने,
तो भूखी – बिलखती, नन्ही सी शकुंतला,
आँचल से छूट ही जाती है.
कौन कहता है की?
भारत की धरती पे नारियाँ,
सती, सीता और सावित्री हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नीलकंठ


आँखों में हैं इरादे तो मंजिल मिल ही जायेगी,
सपनों की चाहत तुझे गैरों में बसायेगी।
ये तेरी हार नहीं है राही की तू जो ये ठोकरों में है,
तेरी ये ही जज्बात तुझे शिखर पे ले जायेगी।
मत विचलित हो यूँ अपमान – पे – अपमान मिलने से,
गरल का ये पान ही तुझे नीलकंठ बनाएगी।
होंसले बुलंद रहे अगर तेरे यूँ ही,
तो अंधकारों के इस तिमिर में भी,
एक-न-एक दिन उषा अपनी लालिमा बिखेरेगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जुल्म


इश्क़ कभी मत करो जुल्म की जंजीरों से,
यहाँ तख़्त बदल जाते हैं, जंजीरे नहीं बदलती।
सीखना है मोहब्बत तो सीखो हुस्न की आँखों से,
जिसके आशिक़ बदलते हैं हर रात, अदायें नहीं बदलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमारी लाज रे


पिता तुम तो हो कैलाश पे,
मैं हूँ यहाँ निराश रे.
तन – मन थकता ही जा रहा,
छोड़ गए विष्णु-ब्रह्मा सब साथ रे.

विकट प्रण धारण कर,
मैं निकला था शान में.
कंठ मेरे सुख चले अब,
और संकट में हैं प्राण रे.

साँसों को अब कोई आस नहीं,
ह्रदय में विश्वास नहीं।
तुम पुलकित कर दो ये पुष्प,
प्रचंड इन धाराओं में,
और रोक दो मेरा मान-मर्दन, उपहास रे.

हम रघुबंशी, हम सूर्यबंशी,
फिर भी कुल है आज कलंकित मेरा।
नाथ बनो, सनाथ करों, हे त्रिपुरारी,
अब तुम्हारे कर कमलों में हैं हमारी लाज रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सर्वोत्तम भार्या


नित संवर कर जो मन को लुभाती हो,
सीने से लग कर जो हर दर्द हर लेती हो.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
अपने चौखट पे हर पल मुस्काती हो.

उषा का जो आँगन में स्वागत करे,
निशा को जो नयनों से चंचल करे.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
जो सेज पे सखी सा सम्मोहित कर लेती हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो श्रवण बन जाओ


सरसों के खेतों में संस्कार नहीं मिलते,
आम के बगीचों में पुरस्कार नहीं मिलते।
समझना है अगर खुद को और पाना है रब को,
तो फ़कीर बन जाओ.
यहाँ यशोधरा तो मिलती हैं महलों में,
पर बुध नहीं मिलते।

किस्मत, कुँवारी किसी की नहीं,
दुल्हन में समझदारी, किसी की नहीं।
पाना है अगर सच्ची मोहब्बत,
तो श्रवण बन जाओ.
पैसा और वक्त, यहाँ, मित्र, शत्रु, पत्नी,
क्या – क्या नहीं बदल जाते।
बस एक माँ को नहीं बदल पाते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक समुन्द्रों का


यूँ ही नहीं मुझे शौक समुन्द्रों का,
कभी कभी तो उतरता हूँ लहरों में.
प्यास तो दरिया भी मिटा दे,
पर फेंक भी तो देती है किनारों पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ताजमहल


मैंने चाहा है तुझे आवारा बनके,
तू मिटा दे मुझे अब बेवफा बनके।

माना की हसरते तेरी महफ़िल में कितनो को,
मगर तुझे भी कोई ठग जाएगा,
किसी दिन तेरा अपना बनके।

हुस्न की बिसात सिर्फ दो-रातों की,
जितना जलना है तू जल ले, शमा बन के.

तेरे यौवन से बढ़के कोई यौवन आएगा एक दिन ,
जो ले जाएगा तेरे परवाने को अपना कह के.

ताजमहल बनाते है जो इश्क़ में उन्हें क्या पता?
कितनो को दफ़न किया है तुमने सजना कह के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाँद यूँ ही मुझसे खफा नहीं रहता


चाँद यूँ ही मुझसे खफा नहीं रहता,
उसे पता है की मेरी माँ का आँचल ही मेरा आसमा है.
वो यूँ ही नहीं गिनाता है,
रह – रह कर मेरे नाम को जाहिँलों में,
उसे पता है की ये शख्श आज भी माँ का दुलारा है।

 

परमीत सिंह धुरंधर