मदिरा मेरे कंठ से उतर कर कर गयी दिल पे जोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?
शाम को जो पुलकित-पुष्प थी, काँटे हो गयी होते भोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?
Rifle Singh Dhurandhar
मदिरा मेरे कंठ से उतर कर कर गयी दिल पे जोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?
शाम को जो पुलकित-पुष्प थी, काँटे हो गयी होते भोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?
Rifle Singh Dhurandhar
सूर्य सा भाल, कौन्तेय का रूप
फिर भी धरा पे ना बंधू ना कुटुंब।
अपना ही तेज है, अपना ही बल
फिर भी सभा में, पल-पल,
क्षण-क्षण, अपमान का घूंट।
वीर के धैर्य का ना कर रण में सामना
पूछते हैं सभी केवल उसका वंश-कुल.
किस्मत के सहारे कब -कहाँ?
हुआ है कोई पौरष हाँ उदित।
पर भाग्य का ऐसा भी होता है एक दंश
ह्रदय, शौर्य ठुकराकर
द्रौपदी चुनती है कुरुवंश का दीप.
Rifle Singh Dhurandhar
मेरी चिड़िया, चुग ले दाना
छोड़ आसमा, बना ठिकाना।
तेरा है कोई, इस जहाँ में
समझ ले तू भी ये अफ़साना।
प्यासी रातें, तड़पते दिन हैं
संसार यही है, आँगन-चहचहाना।
Rifle Singh Dhurandhar
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे छुप ल, या कतनो तेल मल ल
अंग – अंग पे ताहार आज दिहन निशानी।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
साल भर से चल अ तारु मटक-मटक के
हर अ तारु दिल सबके नयना के चटक से
तहरा नस – नस में आज भाँग घोलाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे कूद ल, चाहे फाँद ल
चुनर -चोली आज ताहार दुनो रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
कमरिया पे अपना हिला व् तारुन छपरा
सुगवा फाँस अ तारु लहरा के जोबना
बीच छपरा में आज तहार जोबना रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
Rifle Singh Dhurandhar
होली में आप रहती और मैं रंगता
जवानी का नशा बिना भाँग के ही चढ़ता।
भींगती तेरी चोली मेरे रंग से
और जोबन पे तेरे मेरा रंग चढ़ता।
Rifle Singh Dhurandhar
मैं तो परिंदा बेबस जिंदगी में
क्या सुबहा, क्या शाम मेरी?
उड़ता हूँ तो धरती छीन जाती
लौटता हूँ तो आसमा, कहाँ मेरी।
Rifle Singh Dhurandhar
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
कई जुल्म की आँधिया गुजरी हैं इन राहों से-२
पर हार बार जख्म तेरे
पर हार बार जख्म मैं तेरे नैंनो से खाता हूँ.
और क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं खुद को मिटाने की ही
मैं खुद को मिटाने की ही हर बार चल रखता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
Rifle Singh Dhurandhar
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
दउरा तारी आँगन से देख अ हाँ दुआरी
रह गइल कोठी के खुलल हाँ किवाड़ी।
बाबू साहेब लेके हाँ छपरा के पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
अरे भागल बारी खेता – खेती, जाके हाँ गाछी
बच्चा पूछ अ तारन सन कहाँ गइली माई?
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन साली आ सरहज पारा -पारी।
इ कहस जीजा जी, अब त रहे दी
उ कहस, पाहुन ऐसे ना भीतर डाली।
बाबू साहेब लेके हाँ छपरा के पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन मोटकी आ पतरकी पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन साया आ साड़ी पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन नयकी आ पुरनकी पारा-पारी।
Rifle Singh Dhurandhar
मोहब्बत इतना भी ना करो
की शिकायतें बढ़ जाए.
दूरियां इतनी भी ना कम हो
की दीवारें उठ जाए.
सभी इंसान हैं यहाँ
सबकी अपनी-अपनी हैं जरूरतें
खिड़कियों से ना झाँका करो
की कब -कहाँ, कोई नंगा दिख जाए.
Rifle Singh Dhurandhar
ना भींगा करों ऐसे बरसात में
तड़प उठता है Crassa ऐसी रात में.
तुमको तो मिल गए हैं साथी कई
रह गया मैं ही अकेला इस राह में.
कैसे सम्भालूं एक बार बता दे मुझे?
ज़िंदा हूँ मैं बस इसी एक आस में.
कैसे उठाऊं ये गम, ए दिल बता?
हर रात निकालता है वही एक चाँद रे.
रह गया एक राजपूत नाकाम हो के
इश्क़ ने ऐसे जलाया आग में.
ऐसे ना लड़ा मुझसे अँखियाँ गोरी
बदनाम हूँ शहर में किसी के नाम से.
Rifle Singh Dhurdhar