माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बचपन से जवानी


तुम मिले, तो सबको चाहत हुई,
यूँ ही नहीं जिंदगी बचपन से जवान हो गयी.
तुम्हारी चाल देखके, बीच गयी सबकी आँखे,
यूँ ही तुम्हारे सीने पे, नहीं तलवारे तन गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिस्तर की चाहत


बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मस्ती में बहो मेरे बैलों


दुल्हन सी सजा दू धरती,
सावन सा आँचल इसका।
ऐसे मस्ती में बहो, मेरे बैलों,
की चमक उठे हर कोना इसका।
प्यासे हर कण की,
प्यास मिटा दूँ अपने पौरष से.
हर बदली, हर दरिया, फिर चाहे,
भिगोना बस आँचल इसका।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

शर्म


शर्म भी,
अब बाजार का खेल है.
जितनी महंगी होती हैं,
तुम्हारे दूकान की चीजें।
उतना ही शर्म लेकर वो,
तुम्हारे दूकान पे मुस्काराती  हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शर्म


वो भूल गयी हमको,
अपने इश्क़ के जद्दोजहद में.
उन्हें अब कुछ याद नहीं,
अपना घर बसाने के कसमोकस में.
मगर आज भी नहीं बदला हैं,
उनका वो एक अंदाज।
वो बाजार में मुस्काराती हैं, आज भी,
अपने आँखों में शर्म को उतार के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अंदाज


जिसे जिंदगी भर ग़मों ने लुटा,
उसके मुस्कराने का अंदाज तो देखो।
आंसूं निकलते भी हैं आँखों से,
तो उनके निकलने का अंदाज तो देखो।
कौन नहीं है?
जिसने नहीं कहा अपने जीने के अंदाज को.
मगर जब ये कहें,
तो इनके कहने का अंदाज भी तो देखो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सरदार और गाँधी


सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।
हाल वही होता जो हो रहा है तिब्बत का,
बिना इनके बलिदानो के हम आज़ाद होते नहीं।
वो हैं की,
हमारी आज़ादी को अपनी भेंट और हक़ बताते हैं.
ये हैं की अपना सबकुछ लुटा कर भी,
आज तक कुछ भी जताते नहीं, मुह खोला नहीं।
बंटवारा जिन्होंने स्वीकार किया सरहदों का,
अगर वो इतने धर्मनिरपेक्ष थे,
तो इनका ख़याल आया क्यों नहीं?
सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर