निगाहें ही काफी हैं,
यह दर्द जगाने के लिए.
आदाओं को रखों,
घूँघट उठाने के बाद,
बिजली गिराने के लिए.
परमीत सिंह धुरंधर
निगाहें ही काफी हैं,
यह दर्द जगाने के लिए.
आदाओं को रखों,
घूँघट उठाने के बाद,
बिजली गिराने के लिए.
परमीत सिंह धुरंधर

I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
मिल जाएँ हम तो,
लूट लें ये सारी दुनिया।
I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
नजर में कुछ भी नहीं,
बस जिगर में तुम हो.
तुम मान जाओ तो,
बसा ले अपनी छोटी सी दुनिया।
I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
Figure was from google image.
परमीत सिंह धुरंधर
ना प्रेम करों,
ना उपहास करों।
नारी तो देवी है,
पर,
ना चरण – स्पर्श करों।
ये तो माँ का सम्मान है,
ना माँ का नारी से तुलना करों।
माँ तो शक्ति हैं, माँ तो सत्य हैं,
माँ साक्षात् ब्रह्म है,
बस माँ का ही बंदन करों।
परमीत सिंह धुरंधर
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों बसा लें अपनी,
एक छोटी सी दुनिया।
जिसमे एक चूल्हा हो,
जिसको तुम जलाती हो.
जिसमे एक मुन्ना हो,
जिसको हम खेलाते हों.
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों सजा ले अपनी,
ये छोटी सी बगिया।
जब तुमको चोट लगे,
मैं हल्दी छाप दूँ.
जब मुझको भूख लगे,
तुम मछली बना लेना।
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों बना ले अपनी
छोटी सी कुटिया।
मैं कंगन खरीद लाऊं,
तुम दिन – भर ख़नक़ाना।
मैं साड़ी पहनाऊं,
तुम मुझको नहलाना।
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों एक कर लें,
अब अपनी खटिया।
For Jwala Gutta
परमीत सिंह धुरंधर
ये नजर,
ये हुस्न,
ये रंग तेरा,
मेरे नसीब में नहीं तो क्या हुआ?
मेरी उम्मीदों को,
सवारती तो हैं.
तेरे होंठ,
तेरी जुल्फें,
तेरा आगोश,
मेरा नहीं तो क्या हुआ?
मुझे ख्वाब दिखाती तो हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जीत के लिए,
जंग तो लड़ना होगा।
सत्ता पाने के लिए,
सत्ताधीशों को उखाड़ना होगा।
न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते,
यूँ सर झुका कर अब इनसे।
न्याय चाहिए तो,
आँखे मिलाकर,
न्यायधीशों को ललकारना होगा।
जिन्हें प्यार से आहार चाहिए,
वो बैठ जाएँ अपने घर और गोशालों में.
सबेरा देखने वालों को,
इन अंधेरों से गुजरना होगा।
परमीत सिंह धुरंधर
वीरो की धरती है छपरा,
बलिदानों की गाथा है छपरा।
जब – जब सूरज को बादलों ने ढका है,
तो आँधियों की दास्ताँ हैं छपरा।
गंगा – घाघरा के पावन तट,
पे बसा है चित्रगुप्त -बिखारी ठाकुर का छपरा।
राजेन्द्र बाबु, लोकनायक, महामाया प्रसाद
भारत का पूरा इतिहास है छपरा।
परमीत सिंह धुरंधर
वो भगवा ही क्या जिसमे रंग न छपरा से हो,
वो मिट्टी ही क्या जिसपे कोई वीर न छपरा से हो.
वो हुस्न ही क्या जिसका कोई आशिक न छपरा से हो,
वो वीर ही क्या जिसने जीता दिल न छपरा से हो.
वो राजनीति ही क्या जिसकी धुरी न छपरा से हो,
वो सत्ता ही क्या जिसपे बैठा न कोई छपरा से हो.
परमीत सिंह धुरंधर
आँखों के सपने हजार बार टूटे,
फिर भी दिल धड़क ही जाता है प्यार में.
मेरे दर्द पे वो हजार बार मुस्कराती हैं,
पर दिल भूल ही जाता है उनके दीदार पे.
इश्क़ भी है अपना मरुस्थल जैसा,
जहाँ एक बून्द भी नहीं बारिश की.
पर देख कर हुस्न को,
दिल मयूर सा मचल ही जाता है प्यार में.
परमीत सिंह धुरंधर
वो अपनी मोहब्बत का,
हमपे यूँ सितम कर गए.
हम अब तन्हा – तन्हा रहते हैं,
वो जवान कर गए.
नासमझी थी, या शर्मो – हया,
सब दूरी मिटा के वो सबसे दूर कर गए.
हम अब तन्हा – तन्हा रहते हैं,
वो जवान कर गए.
परमीत सिंह धुरंधर