पापा और परमीत


जब तक थे पापा,
परमीत था निराला।
जब से गए पापा,
परमीत हैं अकेला।
तरकश में मेरे तब,
तीरों की कमी थी.
फिर भीं मेरे तीरों ने,
परचम था लहराया।
तरकश में मेरे अब तीर -ही तीर हैं,
मगर अभी तक मैंने,
एक भी दुर्ग नहीं ढाया।
जब तक थे पापा,
परमीत में परशुराम सी थी प्रखरता।
जब से गए पापा,
परमीत का मतलब हो गया है निर्बलता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रकीब


वो हबीब नहीं, मेरी रकीब थीं,
इसलिए तो दिल के इतने करीब थी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दबंग माँ


माँ लड़ जाए,
माँ भीड़ जाए.
कुछ नहीं समझती किसी को.
क्या गली, क्या मोहल्ले वाले?
अपने बच्चे की खातिर,
माँ,
क्या बुझती अपने पति को?
माँ चूल्हे पे हो,
या आँखे नींद में.
रूह तो भागती है, माँ की,
बस बच्चे के पीछे -पीछे।
अरे मास्टर जी भी डरते हैं,
कान पकड़ने से.
कहीं ज्यादा लाल हो गया तो,
सुननी पड़ेगी उन्हें दिन भर माँ से.
माँ कट जाए,
माँ मिट जाए.
अरे काट डाले माँ किसी को.
क्या गली, क्या मोहल्ले वाले?
अपने बच्चे की खातिर,
माँ,
क्या बुझती अपने पति को?

 

परमीत सिंह धुरंधर

Mother can do anything for her child. You can not explain that by any science.

#Respect_Mom_and_Not_Religion

गुनाहे-इश्क़


जिंदगी मिलेगी जो दूबारा,
तो अब इश्क़ ना करूँगा।
हवाओं का रुख कुछ भी हो मगर,
अब ये गुनाह फिर न करूँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कटे पंखों से भी उड़ सकता है पंक्षी


कटे पंखों से भी उड़ सकता है पंक्षी,
अगर उसके घोसलें में बच्चों की चहचहाट हो.
चूल्हे की आग से झुलसती जिस्म को क्या पता प्यास की?
अगर उसके बच्चों के मुख पे खिली मुस्कराहट हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Respect Mom and not the religion

तू यशोदा ही है माँ


मैं कान्हा ना बन पाया,
पर तू यशोदा ही है माँ.
मैं राम ना कहला पाया,
पर तू कशोल्या ही है माँ.
मैं ना तोड़ पाया तेरे बंधन,
पर तूने मुझे झूला झुलाया।
मैं शिवा जी सा ना लड़ पाया,
पर तू जीजाबाई ही है माँ.

परमीत सिंह धुरंधर

Respect mom and not religion.

Respect your mom and not your religion


बहुत दौलत कमा के मैंने माँ से पूछा,
बोल माँ तुझे क्या चाहिए?
तो माँ बोली,  “चल गरम कहना बनाया है, खा ले जल्दी से.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

ठोकर


जब उसने मेरे दिल को तोड़ा,
ठोकर – पे ठोकर लगा के.
तब मुझे एहसास हुआ, धुप में,
नंगे पैर चलती माँ के प्यार का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Respect mom and not religion.

वो माँ है


जो सिर्फ सूरत देख के मुस्करा दे,
वो माँ है.
जो जेब की भार देख के मुस्कराए,
वो औरत है.
जो कीचड़-मिटटी से सने देह को,
अपने सबसे सुन्दर साड़ी से पोंछे,
वो माँ है.
जो रात में बाहों में आके भी, बाजार की,
साड़ियों और गहनों की बात करे,
वो औरत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पहनते हैं पैंट में लगा कर पैबंद


बहुत दौलत कमा के भी,
जब खुशियाँ दूर ही रही.
तो हमने घुंघरुओं पे,
लुटा दी साड़ी दौलत।
माँ के लिए,
एक साड़ी भी नहीं खरीद सके,
ये गम रहा हमको।
उस सुकून को,
फिर से पाने के लिए,
पहनते हैं पैंट में लगा कर पैबंद।

 

परमीत सिंह धुरंधर