तुम्हे चाहत है जिस समंदर की
उसका किनारा कहीं पराया ना लगे.
हम तो जी लेंगें यूँ ही तड़प -तड़प के
गुलाबों की सेज कहीं तुझे रुलाया ना करे.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हे चाहत है जिस समंदर की
उसका किनारा कहीं पराया ना लगे.
हम तो जी लेंगें यूँ ही तड़प -तड़प के
गुलाबों की सेज कहीं तुझे रुलाया ना करे.
परमीत सिंह धुरंधर
नजर है, नजाकत है
अदा में अदावत है.
कमर है, क़यामत है
खुदा की इनायात है.
ना रखा करो यूँ पर्दा
बस ये ही तो एक शिकायत है.
परमीत सिंह धुरंधर
दौलत की चमक किसे नहीं भाती?
ये शहर है दोस्तों, यहाँ रोशनी नहीं आती.
रिश्तों की राहें तो बहुत हैं यहाँ
मगर कोई राह दिल तक नहीं जाती।
परमीत सिंह धुरंधर
सत्ता के जो लोभी हैं
उनका कोई रिश्ता नहीं।
जो लिख गए हैं कलम से
वो कोई इतिहास तो नहीं।
तुम क्या संभालोगे मुझे?
जब तुम्हारे कदम सँभालते ही नहीं।
तुम्हारा मुकाम अगर दौलत है तो
मेरी राहें वहाँ से गुजरती ही नहीं।
जमाना लिखेगा तुम्हे वफादार
पर हुस्न, जवानी में वफादार तो नहीं।
कुछ किस्से चलेंगे मेरे भी
पर उनमे आएगा तुम्हारा जिक्र तो नहीं।
ये अधूरापन ही है अब बस मेरा जीवन
पूर्णता की तलाश और चाहत तो नहीं।
तुम मिल भी जाओ किसी शाम तो क्या?
उस शाम में होगी अब वैसी बात तो नहीं।
Dedicated to Punjabi Poet Shiv Kumar Batalvi.
परमीत सिंह धुरंधर
कुछ किस्से
वो कमर से लिख गयीं।
कुछ किस्से
वो नजर से लिख गयीं।
जब और लिखना
मुमकिन ना रहा.
वो अपने अधरों को
मेरे अधर पे रख गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
जो सफर में है उसे शहर से क्या मतलब?
मुझे शौक तेरी अधरों का है, तेरी वफ़ा से क्या मतलब?
ला पिला दे तू हलाहल का प्याला
जब तू ही किस्मत में नहीं तो अंजाम से क्या मतलब?
परमीत सिंह धुरंधर
भीड़ में बहती जो वो नीर तो नहीं
तन्हाई में सूखती वो पीर तो नहीं।
टूटते तारें आसमाँ के
कहीं उनका निशाँ तो नहीं।
व्याकुल मन जिसे पल – पल पुकारे
वसुंधरा पे वो कहीं तो नहीं।
इससे बड़ी पराजय क्या होगी?
जब जीत की कोई लालसा ही नहीं।
उतार दो तुम ही ये खंजर मेरे सीने में
इन धड़कनों को तुम्हारी वेवफाई पे यूँ यकीं तो नहीं।
मुझे नहीं पता ए शिव तुम कहाँ हो?
मगर कोई और नाम सूझता भी तो नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
हर किसी की नजर जवानी पे है
बस हम ही हैं सनम जो नादानी पे है.
सब हैं यहाँ दिल जीतने को तेरा
बस हम ही हैं सनम जो दिल हारने पे है.
दौलत – शोहरत, क्या नहीं?
ये तेरे दामन को चाँद -तारों से सजा देंगे।
बस हम ही हैं सनम जो तेरे नखरे उठाने पे हैं.
ना पूछा कर हमसे,
क्या कर सकते हैं तेरे लिए?
जहाँ से सब तेरा साथ छोड़ दे,
वहाँ से हम निभाने पे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.
वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.
परमीत सिंह धुरंधर
दो नैना तेरे काले – काले, चल रहे हैं जमाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, दहक जाए ये जमाना।
कमर तेरी बलखाये, जिसका सागर है दीवाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, बहक जाय ये जमाना।
अंग – अंग पे जैसे बहार आयी है
कमर हुई है वीणा, नयन कतार हुई है.
ये धुप है या छावं, तप रहा है ये जमाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, चालक जाए ये पैमाना।
परमीत सिंह धुरंधर