हमारी लाज रे


पिता तुम तो हो कैलाश पे,
मैं हूँ यहाँ निराश रे.
तन – मन थकता ही जा रहा,
छोड़ गए विष्णु-ब्रह्मा सब साथ रे.

विकट प्रण धारण कर,
मैं निकला था शान में.
कंठ मेरे सुख चले अब,
और संकट में हैं प्राण रे.

साँसों को अब कोई आस नहीं,
ह्रदय में विश्वास नहीं।
तुम पुलकित कर दो ये पुष्प,
प्रचंड इन धाराओं में,
और रोक दो मेरा मान-मर्दन, उपहास रे.

हम रघुबंशी, हम सूर्यबंशी,
फिर भी कुल है आज कलंकित मेरा।
नाथ बनो, सनाथ करों, हे त्रिपुरारी,
अब तुम्हारे कर कमलों में हैं हमारी लाज रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शिव ने जब भी किया है विषपान


शिव ने जब भी किया है विषपान,
जग में तब – तब हुआ है मंगल गान.
नारायण को मिलीं लक्ष्मी,
देवों ने किया अमृत – पान.
जब गरल से बढ़ा जग में संताप,
केवल शिव ने रखा हलाहल का मान.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

गजानन स्वामी मेरे


गजानन – गजानन, प्रभु मेरे,
मुझ पर भी दया दृष्टि करो.
मुश्किलों में है सारी राहें मेरी,
हे विध्नहर्ता, इन्हे निष्कंटक करो.
ज्ञान के आप हो अथाह – सागर,
दिव्य ललाट और विशाल – नयन.
अपने नेत्र-ज्योति से मेरे जीवन में प्रकाश करो.
गजानन – गजानन, स्वामी मेरे,
मेरे मन-मस्तिक में विश्राम करो.
अपमानित हूँ, दलित हूँ,
जग के अट्ठहास से जड़ित हूँ.
आप प्रथम -पूज्य, आप सुभकर्ता,
महादेव – पार्वती के लाडले नंदन।
मेरे मस्तक पे अपना हाथ रखों।
गजानन – गजानन, स्वामी मेरे,
इस अपने सेवक का भी मान रखो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बस शिव ही अनन्त हैं


शिव तो अजर हैं,
शिव तो अमर हैं.
शिव के समक्ष कोई तो नहीं,
जो प्रखर है.
शिव के समुख,
सब भेद मिट जाता है.
अमृत-विष, शिव के समक्ष,
सब एक सामान हैं.
शिव तो प्रचंड हैं,
शिव तो अखंड है.
काम को भस्म किया,
काल को अधीन किया।
कैलाश पे विराजकर,
धरती को सुशोभित किया।
शिव ही नृत्य हैं,
शिव ही संगीत हैं.
समस्त सृष्टि में कोई तो नहीं,
जो ना शिव के अधीन है.
शिव तो आदि हैं,
शिव ही अंत हैं.
सम्पूर्ण सृष्टि में,
बस शिव ही अनन्त हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शिव ने कंठ के अधीन किया


अमृत के लालच में समुन्द्र का मंथन हुआ,
प्रकट हुआ जब गरल,
तो बल के साथ लोभ का भी अंत हुआ.
सुर क्या, असुर क्या,
मंदराचल और सर्पराज बासुकी,
का मन भी भयक्रांत हुआ.
मच गया हाहाकार,
मिट गया हर एक भेद-भाव,
छोड़ कर अमरत्व,
सब ने सिर्फ जीवन को बचाने का प्रयत्न किया।
पशु-पक्षी, और वृक्ष,
कट – कट, कर गिरने लगे,
ताल -तलैया, नदी -सागर,
सबको गरल ने सोंख लिया।
जब शिव के आँगन में,
कोई और काल बन,
जीवन के मस्तक पे, तांडव का आरम्भ किया।
तो शिव ने खोल दी आँखे,
और महाकाल बनकर,
उस कालरूपी – गरल को,
अपने कंठ के अधीन किया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अर्जुन – पुत्र अभिमन्यु


यूँ ही धरा पे,
अब नहीं धीरज धरूँगा,
तुम कहोगे,
तो आज से ही युद्ध होगा।
साँसों के आखिरी क्षणों तक,
भीषण संग्राम होगा।
लाएंगे तुम्हारे स्वप्न, या फिर,
कुछ नया ही अंजाम होगा।
मुठ्ठी भर हैं, तो ये मत सोचो,
की मसल दिए जाएंगे।
आज ग्रहों-नक्षत्रों,
और स्वयं सूरज तक,
अर्जुन – पुत्र अभिमन्यु का,
तेज होगा।
भीषण – बाणों की बर्षा होगी,
चारों दिशाओं से.
जर्रे – जर्रे पे आज, सुभद्रा – पुत्र,
के रथ का निशान होगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

विभीषण – मेघनाथ


पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।
मैं अपनी तीरों से सृष्टि का संहार कर दूँ,
मुझे पिता के सिवा, कहीं कुछ भी दिखता नहीं।
तुम भूल गए भ्राता, कुल -संबंधी,
मैं इस जनम में ऐसा द्रोही तो नहीं।
काका श्री, तुम ज्ञानि हो समस्त वेदों को पढ़कर,
मगर मेरी नजरों में, ये पिता के चरणों की धूल भी नहीं।
मेरी जवानी चाहे मखमल पे फिसले,
मेरी जवानी चाहे काँटों पे बिखरे।
आखिरी क्षणों तक बस पिता से प्रेम करूँगा,
चाहे मोक्ष मिले या आत्मा भवसागर में भटके।
मेरी नजरों के सामने हो जाए लंका का पतन,
इस जीवन में ऐसा तो मेरे रहते होगा नहीं।
पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण-मेघनाथ


शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।
रण में रावण का आना तो बहुत दूर,
कोई मेघनाथ से पहले दो दावँ खेल के तो देखे।
इंद्रा को हरा के जो लौटा था मेरे पास,
प्रिये सुलोचना के लिए, जिसने दिया शेषनाग को पछाड़।
वो लहू है मेरा, कोई ललकार के तो देखे।
शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभिमन्यु – दुर्योधन संवाद


अभिमन्यु को देखकर दुर्योधन अट्टहास करता हुआ बोला, “अभी बालक हो, लौट जाओ. अभी तो तुमने जीवन में कुछ किया ही नहीं। तुम यूँ अपने जीवन को बेकार मत करो.”
अभिमन्यु ने सबको प्रणाम करने के बाद कहा,
” जीवन में मधुरता प्यार से हैं,
जीवन की प्रखरता कर्म से है,
मगर जीवन की महानता त्याग से है.
इन तीनो के बिना जीवन कुछ नहीं,
और जब जीवन नहीं तो फिर धर्म क्या?”
दुर्योधन ने कहा, “अगर जीवन प्रेम और त्याग है, तो क्या तुम्हे अपने बंधुओं से प्रेम नहीं? क्या तुम उनके जीवन के लिए ये सत्ता का त्याग नहीं कर सकते?”
अभिमन्यु, “प्रेम तो बहुत है. और हमने त्याग भी किया था. आज भी ये लड़ाई हम सत्ता के सुख के लिए नहीं लड़ रहे. अगर लड़ाई सत्ता के सुख की होती तो मैं इस कुरुक्षेत्र में नहीं खड़ा होता। यह हमारा संघर्ष है आपके अत्याचार के खिलाफ। यह संघर्ष है आपकी निरंकुशता के खिलाफ, आपके लोभ, और आपके दमन के खिलाफ।”
अभिमन्यु, “तात श्री, बिना संघर्ष का त्याग, त्याग नहीं; बिना संघर्ष के प्रेम, प्रेम नहीं और बिना संघर्ष के कर्म, कर्म नहीं। अथार्थ, मानव के जीवन की हर परिभाषा और उसकी जवानी बिना संघर्ष के कुछ नहीं। हमारी ये लड़ाई न तो सत्ता के लिए है, ना आपके दमन के लिए. ये हमारा संघर्ष है इस समाज से, जिसके आप चालाक और पालक हो. हम चाहते हैं की इसको बदल दे, और ये संघर्ष है उस बदलाव के लिए.”

 

परमीत सिंह धुरंधर